भगवान और भक्ति के मूल मार्ग से भटकाने में जुटे धंधेबाज: आस्था के नाम पर पनपता व्यापार सनातन संस्कृति के लिए सबसे बड़ा संकट
बांसवाड़ा : असली धर्म, अनुष्ठान और पूजा-अर्चना में धन-दौलत या बड़े संसाधनों का कोई स्थान नहीं होता। वास्तविक मंदिर और तीर्थ वही हैं, जहाँ एक निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी बिना किसी रोक-टोक और भेदभाव के ईश्वर के दर्शन कर सके। जहाँ बिना एक पैसा खर्च किए पुण्य प्राप्ति के सभी मार्ग सुलभ हों, वही सच्चा सनातन धर्म है।
ज्योतिष और कर्मकांड के नाम पर भय का कारोबार
आजकल ज्योतिष और धर्म-कर्म को सेवा के बजाय कमाई का जरिया बनाने वालों की भीड़ लगातार बढ़ रही है। इनमें से अधिकांश लोगों के पास न तो कोई शास्त्रीय डिग्री है और न ही किसी गुरुकुल का गहन अध्ययन। केवल ऑनलाइन जानकारी के बल पर शेखी बघारने वाले ये तथाकथित ज्ञानी जातकों के शोषण और दोहन में लगे हैं।
डूंगरपुर के प्रसिद्ध ज्योतिर्विद स्व. पं. विद्याशंकर रावल ने कहा था: "ईष्ट बिना सब भ्रष्ट है, ज्योतिष, वेद, पुराण।"
दुर्भाग्यवश, आज इस उक्ति को भुला दिया गया है। सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप ग्रुपों में भी बिना शुल्क के कोई परामर्श देने को तैयार नहीं है। जातकों को कालसर्प दोष, पितृ दोष, ग्रह शांति, वास्तु दोष और भूत-प्रेत का भय दिखाकर महँगे रत्न, तंत्र-मंत्र और महँगी पूजा-विधियों के नाम पर लूटा जा रहा है।
मुफ्त और शास्त्रीय उपायों से दूरी क्यों?
शास्त्रीय विधान के अनुसार, कई ऐसे सहज और निष्शुल्क उपाय हैं जो ग्रहों को अनुकूल बनाते हैं:
पर्यावरण एवं प्रकृति रक्षा: पौधे लगाना और वृक्षों की रक्षा करना।
जीव दया: पहली रोटी गाय को और अंतिम रोटी कुत्ते को देना, चींटियों को दाना डालना।
अतिथि यज्ञ व सेवा भाव: असहायों की मदद और परोपकार।
परंतु ये धंधेबाज ऐसे उपाय कभी नहीं बताते, क्योंकि इससे उनकी जेबें नहीं भरतीं।
आडंबर और बाजारीकरण से बढ़ रही नास्तिकता
धर्म के नाम पर हो रहे इस व्यापार का दुष्परिणाम पूरे सनातनी समाज को भुगतना पड़ रहा है। जब लोग महँगे अनुष्ठान और टोटके करने के बाद भी राहत नहीं पाते और निराशा हाथ लगती है, तो ये धंधेबाज बड़ी बेशर्मी से कह देते हैं—"आपकी श्रद्धा में ही कमी रही होगी।"
इस तरह के छलावे से आम जनमानस का आस्था, परंपराओं और धर्म से विश्वास उठने लगा है, जिससे समाज में नास्तिकता और धर्म परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याएँ जन्म ले रही हैं। भगवान को अंतर्यामी और कृपासिंधु मानने के बजाय, इन लोगों ने ईश्वर को जैसे कामना पूर्ति करने वाला दिहाड़ी मजदूर समझ लिया है—थोड़ा चढ़ावा चढ़ाओ और काम कराओ।
दिखावा हावी, साधना पक्ष हुआ गौण
आज धार्मिक आयोजनों से शुचिता और सिद्धांत गायब हो चुके हैं।
शोर-शराबा और फैशन: साधना और ध्यान का स्थान कानफोड़ू डीजे, फिजूलखर्ची और उत्सवी नाच-गान ने ले लिया है।
गौसेवा की अनदेखी: कई मठों और मंदिरों के भीतर भागवत कथा के दौरान गोपाल-गोपाल का शोर मचता है, जबकि परिसर के बाहर गायें बदहाली और प्रताड़ना झेलने पर मजबूर हैं।
सच्चे मार्गदर्शकों की आज समाज को अत्यंत आवश्यकता
इन विकट परिस्थितियों में भी वे गिने-चुने ज्योतिषी, विद्वान और साधक साधुवाद के पात्र हैं, जो बिना किसी लालच या अपेक्षा के लोकोन्मुखी जीवन जी रहे हैं। वे जातकों को सहज, सरल और नि:शुल्क उपाय बताकर सही दिशा दिखा रहे हैं।
निष्कर्ष:
गुरुओं, पंडितों और सनातन धर्म के जिम्मेदार संवाहकों का यह परम कर्तव्य है कि वे लोगों को अंधविश्वास, आडंबर और चमत्कार के मोहपाश से निकालकर भक्ति, नित्य कर्म और आत्म-कल्याण के सच्चे मार्ग पर लाएँ। यदि समय रहते इन धार्मिक माफियाओं और धंधेबाजों के खिलाफ समाज जागरूक नहीं हुआ, तो यह प्रवृत्ति सनातन धर्म के मूल ढाँचे को गहरा नुकसान पहुँचाएगी।
विशेष रिपोर्ट: डॉ. दीपक आचार्य

