स्मार्टफोन बना जाल, 'Like और Review' के बदले आबरू तार-तार: 30 से ज्यादा युवतियों के अश्लील वीडियो बरामद

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डिजिटल ठगी और आबरू का सौदा: 'वर्क फ्रॉम होम' के नाम पर जोधपुर से मुंबई तक फैले घिनौने गिरोह का पर्दाफाश, 2 गिरफ्तार

जोधपुर : तकनीक के इस दौर में जहाँ स्मार्टफोन युवाओं को स्वावलंबी बनने का सपना दिखाता है, वहीं कुछ आपराधिक तत्व इसे ब्लैकमेलिंग और शोषण का हथियार बना रहे हैं। जोधपुर पुलिस की साइबर सेल ने 'वर्क फ्रॉम होम' के नाम पर युवतियों को अपने जाल में फंसाकर अश्लील वीडियो बनाने और उनका शारीरिक-मानसिक शोषण करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का भंडाफोड़ किया है। मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुंबई से दो आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है।

मासूमियता पर साइबर स्ट्राइक: स्नैपचैट पर जॉब का झांसा देकर ब्लैकमेलिंग करने वाले फैजान और आमिर गिरफ्तार
झांसे से जाल तक: कैसे दिया घटना को अंजाम

जानकारी के अनुसार, गिरोह ने स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 'वर्क फ्रॉम होम' और आसान कमाई (लाइक और रिव्यू के बदले पैसे) का आकर्षक विज्ञापन डाला था। जोधपुर की एक 18 वर्षीय पीड़िता जब आत्मनिर्भर बनने की चाह में इनसे जुड़ी, तो धीरे-धीरे झांसे में लेकर उसकी निजता और अश्लील सामग्री हासिल कर ली गई।

तस्वीरें और वीडियो कब्जे में आते ही आरोपियों ने ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू कर दिया। पैसों की अवैध उगाही के साथ-साथ पीड़िता को होटल के कमरे में बुलाकर उसकी आबरू तक तार-तार की गई। सामाजिक प्रतिष्ठा और डर के साए में पीड़िता महीनों तक इस अवसाद और यातना को सहती रही।

गैस सिलेंडर डिलीवरी वाला बनकर पुलिस ने बिछाया जाल

मामला सामने आते ही जोधपुर पुलिस की साइबर सेल हरकत में आई। पुलिस टीम ने तकनीकी अनुसंधान और लोकेशन ट्रेसिंग के आधार पर मुंबई की घनी और तंग गलियों में दबिश दी। पुलिसकर्मियों ने भेष बदलकर (गैस सिलेंडर डिलीवरी मैन) आरोपियों के ठिकाने की सटीक रेकी की और दो मुख्य दरिंदों—फैजान और आमिर को धर दबोचा।

बरामदगी और चौंकाने वाले खुलासे:

  • 30 से अधिक युवतियों के आपत्तिजनक वीडियो मोबाइल और सर्वर से बरामद।

  • 200 से ज्यादा मासूमों का डेटा और कच्चा-चिट्ठा पुलिस के हाथ लगा।

  • देश के अलग-अलग हिस्सों से लड़कियों को निशाना बनाने की आशंका।

डिजिटल सुरक्षा और सामाजिक संवाद पर उठे गंभीर सवाल

यह घटना सिर्फ दो अपराधियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र और सामाजिक सोच पर भी गहरा सवाल खड़ा करती है:

  1. अदृश्य जाल और भ्रामक विज्ञापन: सोशल मीडिया पर बिना जांच-परख वाले 'वर्क फ्रॉम होम' के विज्ञापन युवाओं के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

  2. संवाद की कमी: पीड़ित बेटियां समाज और परिवार के डर से सबसे पहले अपनों से ही बात छुपाने पर मजबूर होती हैं।

  3. जागरूकता की आवश्यकता: साइबर अपराधों से बचाव के लिए केवल पुलिसिया कार्रवाई काफी नहीं, बल्कि परिवारों में खुला संवाद और डिजिटल साक्षरता बेहद जरूरी है।

प्रशासन की अपील: सोशल मीडिया पर अनजान जॉब ऑफर्स, अज्ञात लिंक्स और निजी जानकारी शेयर करने से बचें। किसी भी प्रकार की ब्लैकमेलिंग या साइबर धोखाधड़ी होने पर तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन या राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन (1930) पर शिकायत दर्ज कराएं।

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