इस सूखे के पीछे किसका दोष है और किसका नहीं, इस बात को लेकर कई चैनलों पर प्राइम टाइम में बहस होती रहती है. पर उसके अंत में भी बस एक सवाल ही रह जाता है कि क्या इन बहसों से उन लोगों का कुछ हित होगा, जो सूखे की वजह से अपने घर और ज़मीन को छोड़ कर जाने पर मजबूर हैं.
खैर इस सब के बीच आशा की एक किरण Nethravathi के रहने वाले 17 वर्षीय पवन कुमार के रूप में दिखाई देती है, जिनका परिवार कुछ समय पहले पानी के लिए कोसों दूर चल कर जाता था.
कर्नाटक के सत्तीसरा गांव में कई ऐसे परिवार हैं, जो अपने घरों में कुंए बनवाने के खर्च का वहन कर सकते हैं. पवन कुमार के परिवार के पास इतनी ज़मीन तो थी पर कुंए की खुदाई पर होने वाले खर्च को वो वहन करने में असमर्थ थे.
इसे लेकर पवन चिंतित नहीं हुए और उन्होंने खुद ही कुंए को खोदने का निर्णय किया. इसके लिए पवन ने स्थानीय हाइड्रोलॉजी एक्सपर्ट की मदद ली और उस जगह को चिन्हित किया, जहां पानी मिलने के आसार थे.
अभी उनकी खुदाई को 10 दिन हुए ही थे कि पवन के एग्जाम बीच में आ गए, जिसके लिए इसे कुछ दिनों के लिए रोकना पड़ा. एग्जाम खत्म होने के बाद पवन ने दोबारा खुदाई शुरू की और 45 दिनों की मेहनत के बाद आख़िरकार उनकी पानी की तलाश खत्म हुई.
इस कुंए की खुदाई के बारे में पवन का कहना है कि "तेज गर्मी के बीच पथरीली ज़मीन को खोदना वाकई मुश्किलों भरा काम था, 53 फ़ीट खोदने के बाद पानी के आसार दिखने लगे थे, दो फ़ीट और खोदने के बाद साफ पानी आ गया था. मुझे इस बात की ख़ुशी है कि अब मेरी मां को पानी के लिए दूर जा कर पानी नहीं लाना होगा".
पवन कुमार का ये साहस उन लोगों के लिए आशा की एक किरण की तरह है, जो पानी के अभाव में अपने घर और गांव को छोड़ने पर मजबूर हैं.
