खेती के लिए ठुकराया नौकरी का ऑफर
छोटी-सी उम्र में पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण निर्मल सिंह ने हिम्मत नहीं हारी। परिवार का बोझ कंधों पर आते ही नौकरी की बजाए खेती को तरजीह दी। ट्रिपल एमए, एमएड, एम फिल व पीएचडी करने के बाद उन्हें यूनिवर्सिटी से नौकरी का ऑफर आया था। निर्मल सिंह स्वयं बताते हैं कि अगर सही ढंग से किया जाए तो खेती से बढ़िया कोई कारोबार नहीं है। वे ही किसान कर्ज की वजह से आत्महत्या करते हैं जो कर्ज का सही इस्तेमाल नहीं करते।
अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल
निर्मल सिंह खेती के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। धान की रोपाई से पहले ट्रैक्टर से खेत को समतल नहीं किया। इससे खर्च की बचत होती है। रोपाई से पहले खेत में पानी छोड़ दिया जाता है। लेकिन ट्रैक्टर कभी नहीं चलाया। निर्मल सिंह बताते हैं कि इस तकनीक से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। पानी की खपत भी आधी रह जाती है। वे फव्वारा तकनीक से सिंचाई करते हैं। इससे भी खर्च कम होता है। इसके लिए वे स्वयं दो बार ब्रिटेन हो आए हैं।
लंदन की टिल्डाराइस लैंड से करार
किसान निर्मल सिंह (38) के पास 40 एकड़ जमीन है। 60 एकड़ ठेके पर ले वे पूरे 100 एकड़ में हर साल सिर्फ बासमती की ही पैदावार लेते हैं। इस बार भी पूरे 100 एकड़ में बासमती धान की रोपाई का काम अंतिम चरण में है। 1997 से अब तक खेत में उगी धान की फसल निर्मल सिंह ने कभी मंडी में नहीं बेची। दरअसल वर्ष 1997 से ही लंदन की टिल्डा राइसलैंड कंपनी से निर्मल सिंह का करार है। खेत में लगी फसल को ही कंपनी खरीद लेती है। वो भी महंगे दाम पर। इसी वजह से मंडी में फसल ले जाने का खर्च बच जाता है।
किसान निर्मल सिंह की कामयाबी को देख अब दूसरे किसान भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को तरजीह देने लगे हैं। भुडंगपुर गांव के किसान गुरजीत सिंह ने बताया कि निरक्षरता की वजह से वे अत्याधुनिक तरीके से खेती नहीं कर पा रहे थे। अब खेत में उगी फसल ही महंगे दाम पर बिकने से उन्हें काफी फायदा हुआ है। इसी तरह सरपंच गुरदीप सिंह बताते हैं कि मंडी में बेचने की बजाए अगर घर पर ही फसल के खरीदार आ जाएं तो इससे ज्यादा फायदा और क्या हो सकता है।
