भारत जब भी किसी पड़ोसी देश या क्षेत्रीय ताकत से दोस्तना संबंध बनाता है या रणनीतिक सहयोग करता है, तो यह पाकिस्तान को प्रभावित करता है. दोनों, भारत और पाकिस्तान इस क्षेत्र में मज़बूत प्रतिद्वंद्वी हैं. भारत और ईरान के लिए चाबहार परियोजना का बहुत महत्व है. उधर पाकिस्तान को लगता है कि अगर यह परियोजना सफल हुई तो वो अलग-थलग पड़ सकता है.
इसकी दो-तीन वजहें हैं. पहली वजह यह है कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद इस इरानी बंदरगाह के ज़रिए भारत को अफ़ग़ानिस्तान तक सामान पहुँचाने का सीधा रास्ता मिलेगा.अब तक भारतीय चीजें पाकिस्तान के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचती हैं. इसी परियोजना के ज़रिए भारतीय सामान सेंट्रल एशिया और पूर्वी यूरोप तक सामान भेज सकता है. ऐसे में यह पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा रणनीतिक नुक़सान है.अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटने के बाद बन रहे नए ईरान से हुआ यह समझौता एक बुनियाद है.
पाकिस्तान के लिए ख़तरा यह है कि व्यापार में भारत-ईरान-अफ़ग़ानिस्तान का सहयोग, रणनीति और अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ेगा और इसके पाकिस्तान के लिए नकारात्मक नतीजे निकलेंगे.
जैसे कि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत-ईरान मानते रहे हैं कि उस इलाक़े में जो कुछ भी हो रहा है, उसमें आईसआईएस की भूमिका रहती है.ऐसे में भारत और उसके नए महत्तवपूर्ण सहयोगी साथ मिलकर इन मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा सकते हैं. उससे पाकिस्तान पर रणनीतिक और राजनीतिक दबाव बनेगा.
तीसरी वजह यह है कि भारत जब ऐसी चाल चलता है तो पाकिस्तान ओआईसी या फिर अरब जगत के ज़रिए उसे अलग-थलग करने की कोशिश करता है.
ईरान जैसी सांस्कृतिक, राजनीतिक, रणनीतिक और आर्थिक शक्ति के साथ भारत के अच्छे संबंध पाकिस्तान को कैसे भा सकते हैं. पाकिस्तान इस्लामिक जगत में ख़ुद को बड़ी ताक़त के रूप में पेश करना चाहता है. परमाणु शक्ति बनने के बाद वह इस मकसद में कुछ हद तक क़ामयाब भी रहा है. ईरान उस लिहाज़ से उसका प्रतिद्वंद्वी भी है. अब भारत यदि पूरी तरह ईरान के साथ हो ले तो स्वभाविक है कि ये पाकिस्तान के लिए बुरी ख़बर है.
चाबहार परियोजना भारत के लिए एक रणनीतिक कारक है. चीन-पाकिस्तान के आर्थिक संबंधों को देखते हुए भारत-ईरान की चाहबार परियोजना को पाकिस्तान बड़े रणनीतिक कदम की तरह देखेगा और कभी पसंद नहीं करेगा.
ग्वादर परियोजना में जैसी चीन की भूमिका है, वैसी ही भूमिका आर्थिक परिप्रेक्ष्य में भारत की भी है.भारत ने चाबहार में करीब 10 करोड़ डॉलर का निवेश किया है और मोदी जी 50 करोड़ डॉलर के और निवेश का वादा किया है. पाकिस्तान को लग रहा था कि उसने ग्वादर परियोजना से रणनीतिक बढ़त हासिल कर ली है, लेकिन चाबहर पर हुए समझौते से पाकिस्तान को झटका लगा है.
