
भारत में नोटबंदी को फॉरेन मीडिया ने तल्ख प्रतिक्रिया दी है। नरेंद्र मोदी के फैसले को उन्होंने तानाशाही भरा करार दिया है। ये भी लिखा है कि फैसले से अमीरों को नहीं गरीबों पर असर पड़ा है। वो बैंकों की लाइन में लगे हैं, परेशान हो रहे हैं। अमीर अपने पैसे को शेयर और रियल एस्टेट में खपा रहे हैं।
# द गार्डियन (ब्रिटेन) अखबार ने एडिटोरियल में लिखा, ' नोटबंदी से अमीरों को कोई फर्क नहीं पड़ता। भ्रष्टाचारियों को और मौका मिल गया है। वे अपना पैसा शेयर, गोल्ड और रियल एस्टेट में लगा रहे हैं। लेकिन 130 अरब आबादी वाले जिस देश में गरीब सबसे ज्यादा हैं, उनपर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। उनके पास बैंक अकाउंट नहीं है और उनका सारा लेनदेन कैश में होता है।
ऐसे
लोग कई घंटे लाइन में लग रहे हैं। इस की कीमत वे पैसा और वक्त दोनों देकर
चुका रहे हैं। पॉलिसी को लॉन्च हुए हफ्ताभर ही हुआ है लेकिन बताया जा रहा
है कि इसके चलते दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
उधर, सरकार का कहना है कि परेशानियां खत्म होने में अभी कुछ हफ्ते और लगेंगे। मोदी की ये स्कीम उनकी तानाशाही के नाकाम प्रयोग जैसी साबित हुई है। इससे महंगाई बढ़ेगी, करंसी खत्म होगी और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन होंगे। मोदी करप्शन को खत्म करना चाहते हैं, ये तब हो सकता है जब सरकार टैक्स सिस्टम में सुधार कर ले।
# द न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका) ने लिखा भारत में कैश की राजा जैसी स्थिति है। करीब 78% ट्रांजैक्शंस कैश से होते हैं। वहीं, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे औद्योगिक देशों में कैश से ट्रांजैक्शन महज 20-25% ही है। भारत में ज्यादातर लोगों के पास न तो बैंक अकाउंट्स हैं और न ही क्रेडिट कार्ड्स।
भारत में लोगों का कैश का इस्तेमाल एक तरह से मजबूरी है। ज्यादातर बिजनेस में दूसरे किसी तरीके से पैसा स्वीकार नहीं किया जाता। मोदी के प्लान ने देश की इकोनॉमी को पीछे धकेल दिया। लाखों लोग बैंकों की लाइन में पैसा जमा करने या बदलवाने के लिए लगे हैं।
# ब्लूमबर्ग (अमेरिका) - पहली बार में तो ये फैसला मोदी का मास्टरस्ट्रोक लगता है लेकिन, बाद में भयंकर गलती सा लगता है। एक हफ्ते में क्या बदलाव आए? एक बात तो साफ है कि सरकार ने प्लानिंग के वक्त लापरवाही भरा रवैया दिखाया। फिलहाल, भारत की 86% करंसी किसी काम की नहीं रहेगी। वहां का सेंट्रल बैंक नई करंसी बाजार में पहुंचाने के लिए जूझ रहा है।
नए नोटों का साइन कम है, इसके चलते वे एटीएम से निकल नहीं रहे। मोदी ने लोगों से 50 दिन तक सब्र करने को कहा है लेकिन पूरी तरह प्रॉसेस होने में 4 महीने का वक्त लगेगा। कुछ गांवों में ही एक ही एटीएम है। ज्यादातर को पैसा बदलवाने के लिए बैंक तक जाना पड़ रहा है। लोगों, खासकर महिलाओं का एक्टिव बैंक अकाउंट नहीं है। भारत के फाइनेंशियल सिस्टम को बंद करने के लिए किसी तो जवाब देना होगा।
उधर, सरकार का कहना है कि परेशानियां खत्म होने में अभी कुछ हफ्ते और लगेंगे। मोदी की ये स्कीम उनकी तानाशाही के नाकाम प्रयोग जैसी साबित हुई है। इससे महंगाई बढ़ेगी, करंसी खत्म होगी और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन होंगे। मोदी करप्शन को खत्म करना चाहते हैं, ये तब हो सकता है जब सरकार टैक्स सिस्टम में सुधार कर ले।
# द न्यूयॉर्क टाइम्स (अमेरिका) ने लिखा भारत में कैश की राजा जैसी स्थिति है। करीब 78% ट्रांजैक्शंस कैश से होते हैं। वहीं, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे औद्योगिक देशों में कैश से ट्रांजैक्शन महज 20-25% ही है। भारत में ज्यादातर लोगों के पास न तो बैंक अकाउंट्स हैं और न ही क्रेडिट कार्ड्स।
भारत में लोगों का कैश का इस्तेमाल एक तरह से मजबूरी है। ज्यादातर बिजनेस में दूसरे किसी तरीके से पैसा स्वीकार नहीं किया जाता। मोदी के प्लान ने देश की इकोनॉमी को पीछे धकेल दिया। लाखों लोग बैंकों की लाइन में पैसा जमा करने या बदलवाने के लिए लगे हैं।
# ब्लूमबर्ग (अमेरिका) - पहली बार में तो ये फैसला मोदी का मास्टरस्ट्रोक लगता है लेकिन, बाद में भयंकर गलती सा लगता है। एक हफ्ते में क्या बदलाव आए? एक बात तो साफ है कि सरकार ने प्लानिंग के वक्त लापरवाही भरा रवैया दिखाया। फिलहाल, भारत की 86% करंसी किसी काम की नहीं रहेगी। वहां का सेंट्रल बैंक नई करंसी बाजार में पहुंचाने के लिए जूझ रहा है।
नए नोटों का साइन कम है, इसके चलते वे एटीएम से निकल नहीं रहे। मोदी ने लोगों से 50 दिन तक सब्र करने को कहा है लेकिन पूरी तरह प्रॉसेस होने में 4 महीने का वक्त लगेगा। कुछ गांवों में ही एक ही एटीएम है। ज्यादातर को पैसा बदलवाने के लिए बैंक तक जाना पड़ रहा है। लोगों, खासकर महिलाओं का एक्टिव बैंक अकाउंट नहीं है। भारत के फाइनेंशियल सिस्टम को बंद करने के लिए किसी तो जवाब देना होगा।
