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मोदी या माया, बादल या केजरीवाल, बंद नोट किसे दिलाएंगे चुनाव में वोट?

    500 और एक हजार के पुराने नोट बंद करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐलान के बाद से ही सरकार और विपक्ष आमने-सामने है। पिछले 13 दिन से जहां सरकार नोटबंदी को कालेधन और नकली नोट की समस्या पर सर्जिकल स्ट्राइक बता रही है तो वहीं विपक्ष नोटबंदी के चलते परेशान हो रहे लोगों के बहाने प्रधानमंत्री को घेरने में लगा है। संसद भी इस मुद्दे पर ठप है। नोटबंदी के आर्थिक फायदे कितने और कैसे होंगे ये तो वक्त बताएगा लेकिन दोनों ही पक्ष इसके राजनीतिक फायदों को भुनाने में लग गए हैं। ऐसे समय में जबकि यूपी और पंजाब में चुनाव सिर पर हैं, ये सवाल राजनीतिक पंडितों के लिए माथापच्ची का सबब बन गया है कि आजादी के बाद के इस सबसे क्रांतिकारी फैसले का राजनीतिक फायदा आखिर किसे होगा?
     भाजपा काले धन पर कड़े प्रहार और आतंकवाद-नक्सलवाद की फंडिंग खत्म करने का दावा कर नोटबंदी को भुना रही है तो उसकी चिंता ये भी है कि अव्‍यवस्‍था और अफरातफरी का दौर देर तक रहा तो जनता में ये दांव उल्टा पड़ सकता है। दूसरी ओर विपक्ष लोगों की परेशानियों को मुद्दा बनाकर उनके साथ तो खड़ा दिखना चाहता है लेकिन वो इस बात को लेकर भी सतर्क है कि कहीं उसे भ्रष्टाचारियों, काले धन के कुबेरों के साथ खड़ा न मान लिया जाए। जब दोनों ही पक्ष इतनी सतर्कता बरत रहे हों तो इसके सियासी नफा-नुकसान का आकलन जरूरी हो जाता है।
     नोटबंदी के चलते हो रही मौतों के आंकड़ा बढ़ने लगा तो विपक्ष के हमले भी तीखे हो गए और इस सियासी वार की काट की तौर पर पीएम ने राष्‍ट्रवाद की दुहाई के साथ भावुकता का भी हथियार चलाया। पीएम ने सीधे जनता से संवाद करने और उसकी इस मुद्दे पर राय जानने के लिए अब अपने ऐप के जरिए 10 सवाल पूछे हैं ताकि जनमत का अंदाजा लगाया जा सके।
     सूत्रों का कहना है कि नकदी हासिल करने में लोगों को हो रही परेशानी और उससे उपजी नाराजगी की जानकारी बीजेपी के कुछ राज्‍य प्रमुखों ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को दी हैं। इस फीडबैक के बाद शाह ने खुद आर्थिक मामलों के सचिव शशिकांत दास के साथ बैठक करके हालात संभालने की रणनीति तैयार करने का काम शुरू किया है। दूसरी ओर पार्टी के निर्देश के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों के भाजपा सांसद जनता के बीच जाकर इस बात का प्रचार नहीं कर पा रहे हैं कि नोटबंदी क्‍यों की गई, क्‍योंकि नकदी न मिलने की मारामारी से जनता में नाराजगी है।
     नोटबंदी से हो रही फौरी परेशानी को ढाल बनाकर बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भाजपा पर वार करना शुरू कर दिया है। उनका निशाना यूपी चुनाव है। दूसरी आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने नोटबंदी पर हो रही परेशानी को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्‍होंने इसके खिलाफ देश भर में रैलियां करने का एलान किया है। ममता बनर्जी इस फैसले के खिलाफ काफी मुखर हैं।
     समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने उतनी तल्‍खी नहीं दिखाई है जितनी, माया, ममता और केजरीवाल दिखा रहे हैं। सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के निदेशक प्रो. एके वर्मा कहते हैं कि लोगों को असुविधा हुई है लेकिन वह व्‍यापक नाराजगी में नहीं बदली है। फौरी दिक्‍कत को आधार बनाकर धारणा बना लेना ठीक नहीं होगा। इसी तरह इसे लेकर ज्‍यादा खुश होने की भी जरूरत नहीं है। इस पूरे मामले का सही असर जनवरी 2017 में देखने को मिलेगा। उसी के बाद यह तय हो पाएगा कि इसका राजनीतिक नफा-नुकसान कौन उठाएगा।
     अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर अब्‍दुल रहीम कहते हैं इस मसले पर समर्थन के साथ विरोध के स्‍वर भी हैं। क्‍योंकि बदइंतजामी से लोग परेशान हैं। अब कौन पार्टी विरोध के स्‍वर को अपने वोट में बदल पाएगी यह अभी कहना मुश्‍किल है, क्‍योंकि चुनाव में अभी वक्‍त है और गठबंधनों का दौर शुरू हो चुका है।