जाने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत मे फ़र्क़

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जाने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत मे फ़र्क़

Image result for rashtragan and rashtrageet     वंदेमातरम गीत बकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था जब यह गीत बकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा तब उनकी बेटी ने उनसे कहा की, यह गीत इतना कठिन है की पढ़ने वाले इस गीत को समझ नहीँ सकते, उनकी बेटी ने इस गीत को सरल बनाने के लिए कहा; लेकिन बकिमचंद्र चटर्जी ने कहा की बहौत जल्द यह गीत भारत के क्रांतिविरो के ज़बान पर होगा । बकिमचंद्र चटर्जी ने एक उपन्यास लिखा उसका नाम था "आनंद मठ" यह उपन्यास अँग्रेज़ी व्यवस्था के ख़िलाफ़ था बकिमचंद्र चटर्जी ने "वंदेमातरम" गीत को उस उपन्यास मे डाला, और वह उपन्यास छपते तक 7 वर्ष का समय लग गया, सन 1882 मे यह उपन्यास प्रकाशित हुआ और भारत के अन्य प्रांतो की भाषा मे रुपातरित हुआ, जब इस उपन्यास को लोगो ने पढ़ा तो देश की जनता मे देशभक्ती तेजी जाग उठी और "वंदेमातरम" उद्घोश के साथ आंदोलन होने लगे।  
      1905 मे जब अंग्रेज़ो मे बंगाल का विभाजन सांप्रदाय के आधार पर किया तो देशभक्तो ने इसका बहौत विरोध किया। उस समय के नेता बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य तिलक) बिपिन चंद्र पाल, और लाला लजपत राय ने स्वदेशी आंदोलन छेडा और विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार भारत मे होने लगा; इस आंदोलन का घोशवाक्य "वंदेमातरम" गीत ही था, जहाँ भी सभा होती थी वहाँ वंदेमातरम गीत ही गाया जाता था। स्वदेशी आंदोलन 1911 तक इतना व्यापक हो चुका था की अंग्रेज़ी वस्तु (जैसे शक्कर, ब्लेड, कपडा, और अन्य वस्तूए) का व्यापार पूर्णता: ध्वस्त हो चुका था। आपको बता दूँ की स्वेदशी आंदोलन को अंग्रेजो ने "वंग भग" आंदोलन नाम दिया था, इस आंदोलन की कमान पश्चिम भारत मे लोकमान्य तिलक, उत्तर भारत मे लाला लजपत राय, और पूर्व भारत मे बिपिन चंद्र पाल संभाल रहे थे । 1911तक ईस्ट इंडीया कंपनी का व्यापार ध्वस्त हो चुका था, तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लिश सरकार पर दबाव बनाया और बंगाल का विभाजन वापस लेने के लिए कहा था बंगाल का विभाजन सांप्रदाय के आधार पर हुआ था पूर्व बंगाल मुस्लिम और पश्चिम बंगाल हिंदूओ के आधार पर बंगाल का विभाजन हुआ था, यह विभाजन तब वापिस लिया गया जब स्वदेशी आंदोलन (वंग भंग आंदोलन) देश मे व्यापक रूप लिया गया तब 1911 मे अंग्रेजो को बंगाल का विभाजन वापस लेना पडा था; अँग्रेज़ी शासन मे वह पहला ऐसा कानून था जिसे अंग्रेजो को वापस लेना पड़ा था । बंगाल का विभाजन होने के बाद लोकमान्य तिलक ने स्वदेशी आंदोलन चालू रखने की अपील अपने समाचार पत्र "केसरी"से देश की जनता से की। लेकिन 1912 मे स्वेदेशी आंदोलन (वंग भंग आंदोलन वापस लिया गया) लेकिन बंगाल मे ईस्ट इडिया कंपनी का व्यापार ठप्प हो चुका था, अंग्रेजो को लगा की वह अब कोलकाता मे सुरक्षित नहीँ तो उन्हो ने अपनी राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाई। 
     1911 तक भारत मे वंदेमातरम गीत की अपार लोकप्रियता तब बढ़ी जब सबसे कम उम्र मे फांसी के फंदे पर लटकने वाले क्रांतिकारी खुदिराम बोस ने "वंदेमातरम" कह कर ख़ुशी ख़ुशी फाँसी के फंदा गले लगा लिया। 1911 मे इंग्लंड का राजा भारत आया तब उसके स्वागत मे एक गीत लिखा गया उस गीत का नाम है "जन गन मन" दरसल उस गीत को अंग्रेजो ने रविंद्रनाथ टागौर पर दबाव डालकर लिखवाया था, जब यह गीत जॉर्ज पंचम के स्वागत मे गाया गया तब जॉर्ज पंचम को ज़्यादा कुछ समझ नहीँ आया; लेकिन जब उसने इस का इंग्लिश अनुवाद किया तब वह बहौत ख़ुश हुआ, उसने कहा की इतनी खुशामत तो मेरी इंग्लड मे भी नहीँ होती; सौभाग्य से जॉर्ज पंचम नोबेल समिती का चेयरमन भी था तो उसने इस गीत पर रविंद्रनाथ टागौर को नोबेल दिया गया; लेकिन टागौरजी ने कहा की यह नोबेल मेरे गितांजली पर मिल रहा है ऐसा प्रचारित करे, और वैसा ही हुआ; दरसल जॉर्ज पंचम के स्वागत मे गाया गया "जन गन मन" गीत पर नोबेल दिया गया था। रविंद्रनाथ टागौर अग्रेजो के बहौत करीबी माने जाते थे, उनके परिवार का ज्यदातर रुपया ईस्ट इंडिया कंपनी मे लगा था; 1919 के पहले रविंद्रनाथ टागौर द्वारा लिखे गए ज़्यादातर लेख अंग्रेजो के समर्थन मे थे। रविंद्रनाथ टागौरजी की अंग्रेजो के साथ साहनुभुती 1919 के जालियावाला बाग हत्याकांड के बाद खत्म हुई; जब जालियावाला बाग हत्याकांड हुआ तब गांधीजी ने टागौर जी को चिठ्ठी लिख कर भला बुरा कहा और बाद मे उनसे मिलने बाद कहा की "तुम इतने अंग्रेजो को इतने चाटुकार कैसे हो सकते हो ?" तब जाकर रविंद्रनाथ टागौरजी ने अंग्रेजो की दी गई उपाधिया वापिस कर अंग्रेजो के विरोध मे लिखना शुरू किया। रविन्द्रनाथ टागौर के बहनोई सुरेन्द्रनाथ बनर्जी लंडन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे; अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है । इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है, इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे; 7 अगस्त 1941 को रविंद्रनाथ टागौर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।
      1911 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी, लेकिन वह दो खेमो में बट गई; जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर, मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने; जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है । इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया, कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए एक नरम दल और एक गरम दल।
    गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी वे हर जगह वंदेमातरम गाया करते थे और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु।
     नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है, उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे, उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे; उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वंदेमातरम गाने से मना कर दिया, जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली, संविधान सभा की बहस चली संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बकीमचंद्र चटर्जी द्वारा लिखित वंदेमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।
       बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु, उनका तर्क था कि वंदेमातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी) अब इस झगडे का फैसला कौन करे? तो गांधीजी ने कहा कि "जन गन मन" के समर्थन मे मै भी नहीँ हूँ, वन्देमातरम के पक्ष में तुम नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाए; तो नेहरुजी ने गांधीजी से कहा आप ही तो तीसरा विकल्प बताए । गांधीजी ने तीसरे विकल्प के रूप मे झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा” लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए, नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है; उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधीजी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्रगान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वंदेमातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।
भारत की लुट
     इतिहास कुछ भी हो आज जन गण मन हमारा राष्ट्र गान है, और हम इसे स्वीकारते है, क्युकी हम कोई वीर, क्रांतिकारी नहीं जो राष्ट्र हित के लिए लड़ सके। क्यू की हमने 15 अगस्त 1947 को गोरे अंग्रेजो से काले अग्रेजो को सत्ता हस्तांतरित कराई थी; पहले गोरे अंग्रेज लूटते थे आज काले अंग्रेज लुट रहे है; मुझे एक व्यक्ति ने पुझा क्यू सोनू भाई आप इन राजनीतिक पुढारियो को काले अंग्रेज क्यू कहते हो ? मैने बड़े विनम्रता पूर्वक उत्तर दिया - ना तो देश की भाषा बदली है ना देश की भुशा ना अंग्रेजो द्वारा बनाए गए 35 हज़ार कानून देश के 65% सांसद अँग्रेज़ी मे बहस करते है, बयानबाजी अंग्रेजी मे होती हो उन्हे क्या कहे ? पैदा तो हम भारत मे हो गए लेकिन हमारी संस्कृती बदल गई, हमारे कपड़े इतने छोटे हो गए है की देखने वाले सज्जन व्यक्ति को शर्म आती है, देश मे अश्लीलता इतनी बढ़ गई है की प्रतिवर्ष 20 हज़ार करोड़ रुपए का कारोबार कंडोम कंपनिया भारत मे करती है। जिस देश मे जहरिला विदेशी कोल्डड्रिंक 40 रुपए लिटर है उस देश मे 25 रुपए लिटर गाय का दूध लोग पीना पसंद नहीँ करते । जिस देश मे सरकारी कर्मचारियों को एक सस्ताह मे एक हाप डे और एक फुल डे हॉलीडे होता है अगर कोई त्योहार या जयंती आई तो हॉलीडे मिलता हो, और एक हमारा देश का किसान जिसे कभी छुट्टी ही नही मिलती। हम उस देश के निवासी है जिस देश मे काले अंग्रेजो का साम्राज्य चलता है; जो की आज़ादी के बाद कुछ नहीँ बदल सके सिवाय लुट के, अंग्रेजो ने 250 वर्षों मे 300 लाख करोड़ की संपत्ति लुटी थी; अब इन काले अंग्रेजो ने 69 वर्षों मे ही 250 लाख करोड़ रुपया लुट कर स्वित्झरलँड की बँको मे जमा कर दिया। अब पता चला की हमारे देश के संसद मे आज़ादी के 69 वर्षो मे भी वंदेमातरम नहीँ गाया जा सका; क्युकी इन पॉलिटिशीन्स के शरिर मे अंग्रेजो की आत्मा घुसी हुई है और अब यह काले अंग्रेज कहलाते है। दुनिया का छोटासा देश है जो तीन बार ग़ुलाम हुआ जिस देश को दूसरे विश्वयुद्ध मे अमरीका ने बरबाद कर दिया था वह देश दुनिया मे इतने ताक़त के साथ उभर गया है की अमरीका मे 25% व्यापार पर उसी का साम्राज्य है, पड़ोसी देशो को क़र्ज़ा भी देने लगा है, तकनिकी मे बहौत आगे हो चुका है ऐसे देश का नाम है "जापान" जापान आज दुनिया के सामने जिस ताक़त से खड़ा है वह ताक़त उनकी स्वदेशी की है, जापान मे बनने वाली प्रत्येक वस्तु उनके लिए ब्रँड है। लेकिन हमारे देश मे सब उलटा है यहा पाश्चिमात्य संस्कृती से कोई व्यावहार करे तो वह एज्युकेटेड है; अगर हर समय अंग्रेजी बोलता है तो वह Well एज्युकेटेड है, अगर वह अंग्रेजी भुशा परिधान करे तो वह बहौत बहौत ज़्यादा पढ़ा लिखा है; अगर कोई ब्रँडेड कपड़े पहने तो वह बहौत अमीर है । लेकिन भारतीय लोगो को यह पता नहीँ है की जिसने दुनिया को 0 से लेकर 9 तक गिनती सिखाई, जिसका त्रिकोननिती, गणित मे महत्वपूर्ण योगदान है उसी के साथ अंतरिक्ष मे संसोधन करने वाले महान खगोलशास्त्री आर्यभट्ट विश्व के प्रथम विश्वविद्यालय के कुलपती बने।
     व्हिएतनाम जैसा छोटासा देश, जागतिक महासत्ता अमरीका से लढ सकता है और उस युद्ध मे अमरीका को पीछे हटना पड़ा था, दुनिया महासक्तिशाली देश को धूल चटाने वाला छोटासा देश व्हिएतनाम को शिवाजी महाराज से अमरीका के साथ लढाई करने की प्रेरणा मिलती है हम उसी वीर शिवाजी महाराज के देश वासी होने का अभिमान होना चाहिए, ना की अमरीका युरोप मे नौकरी करने के सपने देखने चाहिए । जिस देश ने दुनिया को संस्कृत, और प्राकृत भाषा दुनिया दी; आज दुनिया की 29000 भाषाए मुलत: संस्कृत और प्राकृत भाषाओ की उपभाषाए है। देवनागरी लिपी के माध्यम से दुनिया को हमने लिखना सिखाया, और ब्राम्ही लिपी के माध्यम से दुनिया मे अनेक लिपियो का निर्माण किया। अर्थात हमने ही दुनिया को बोलना लिखना सिखाया, दुनिया को स्टिल हमने दिया; 17 वी शताब्दी तक युरोप और दुनिया मे कोई स्टिल बनाना नहीँ जानता था, हमारे देश मे 3000 वर्षो से स्टिल का उत्पादन होता रहा है, इसका प्रमाण दिल्ली के पास अमरोली गांव मे हजारो वर्षों से स्थित एक स्तंभ है। और उस काल मे भारत का स्टिल का व्यापार दुनिया मे सबसे बड़ा बाजार था और भारतीय व्यापारी स्टिल के बदले मे सोने की मांग करते थे उसी के साथ भारत का कपड़ा भी दुनिया के बाजारो मे प्रिमियम प्राईज् मे बिकता था, भारत का कपड़ा युरोप, अरब और अन्य देशो के राजा महाराजा पहनते थे, और भारतीय व्यापारी उसी कपड़े के बदले मे सोना लेकर भारत आते थे। इस तरह का सबसे बड़ा भारत दुनिया सबसे ज़्यादा निर्यात करने वाला देश आज से 300 वर्ष पूर्व रहा है। आज से 1000 वर्ष पहले मुगल देश मे आए और उन्होने देश को लुटा, मोहमद गजनवी को सोमनाथ मंदिर को लूटने मे 3 वर्ष लग गए थे फिर भी वह पुर्णत: सोमनाथ मंदिर की संपत्ति लुट नहीँ पाया था। अंग्रेजो ने जब पहली बार कोलकाता शहर मे लुटमार की थी तब उन्हे वह लुटी हुई संपत्ति इंग्लंड ले जाने मे 900 जहाज़ लग गए थे। आज विदेशी कंपनिया और काले अंग्रेज देश को लुट रहे है, और हम, यह पाखंडी बाबा हमे कहते "जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, आगे जो होगा वह अच्छा ही होगा, तुम क्यू व्यर्थ की चिंता करते हो, तुम साथ मे क्या लाए थे ? और क्या लेकर जाओगे?" अरे यह वाक्य भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को रनभूमि दिया था ताकि अधर्मी का साथ देने वाले अपनो को भी वह परास्त कर सके। और इधर देश लुट रहा है, और यह पाखंडी हमे उपदेश देते है की "जो हो रहा है अच्छा हो रहा है" अर्थात- देश लुट रहा है अच्छा हो रहा है, "जो होगा अच्छा होगा" अर्थात- आगे भी देश लुटेगा और अच्छा होगा, "तुम व्यर्थ की चिंता क्यू करते हो?" अर्थात - देश लुट रहा है आगे भी लुटेगा तुम व्यर्थ की क्यू चिंता करते हो ?, " तुम साथ मे क्या लाए थे और क्या ले जाओगे ?" अर्थात- देश को लूटने वाले लुट रहे है तुम्हारी क्या ज़िम्मेदारी है तुम साथ क्या लाए थे जो साथ लेकर जाओगे? एक पाखंडी बाबा उपदेश देने आता है और लाखो रुपए बटौर कर एक ही दिन मे लुट कर चले जाता है, यह बापू नहीँ डाकू है, चारो ओर लुट मची है। 
    एक पाखंडी बाबा उपदेश देने आता है और लाखो रुपए बटौर कर एक ही दिन मे लुट कर चले जाता है, यह बापू नहीँ डाकू है, चारो ओर लुट मची है; क्युकी इस देश मे एक इंन्सान ने इस लुट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी उसे मार दिया गया उसका नाम है राजीव दिक्षीत, अब इस देश मे ऐसा कोई लोकमान्य तिलक नहीँ बचा है, जिसने गणपति उत्सव की स्थापना कराई और गणपति उत्सव मे वंदेमातरम गीत से लोगो को संघटित किया और स्वदेशी आंदोलन की सुरुवात की। इस देश मे अब नहीँ है "वंदेमातरम" बोल कर फाँसी पर चढने वाला सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी खुदिराम बोस हंसते हंसते फाँसी पर चढ़ जाए। भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर, सुबास चंद्र बोस,उधमसिंह, अश्फाक उल्ला, जैसे लाखो क्रांतिकारीयो ने इसी दिन के लिए अपना बलिदान नहीँ दिया था। और हम कब तक आंखो के समने हो रही लुट को देखकर भी चुप रहेंगे? आओ एक कदम स्वदेशी वस्तुओ की ख़रीदी की ओर बढाए ताकी ग़रीब को रोजगार मिल सके देश का पैसा देश मे ही रह सके, और दुनिया मे देश की सबसे बड़ी अर्थसत्ता के रूप मे देश को स्थापित करना है। स्विस बँको मे रखा भारतीय हरामखोरो के पैसे को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने के लिए सरकार पर दबाव डाले ताकि 250 लाख करोड़ रुपया भारत वापिस आ सके, और इतने रुपए मे हम देश को सोने की चिड़िया नहीँ बनाना है; सोने का शेर बनाना है। आओ एक कदम बढाए स्वदेशी अभीयान की ओर।।

*वंदेमातरम*
*सोनू भगत*
*अमर बलिदानी राजीव दिक्षीत को शत् शत् नमन*

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