कोरोना के फैलाव में केतु टाइप के व्यक्तियों का कितना है योगदान?

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कोरोना के फैलाव में केतु टाइप के व्यक्तियों का कितना है योगदान?

क्या कोविड़-19 के शुरुआती मामले चीनी शहर वुहान में स्थित हुनान बाज़ार से जुड़े हैं?
(SARS-CoV-2?)
वायरस के जानवर से इंसान में पहुँचने की संभावना कितनी है? 
कोरोना की शुरुआत कहां से हुई?
    एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़, इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि इंसानों तक पहुँचे कई कोरोना वायरसों की उत्पत्ति जीव-जंतुओं से हुई है. वो चमगादड़ भी हो सकता है. चमगादड़ ऐसे जीव-जंतुओं में शामिल है जिनमें कई वायरस होते हैं जो इंसानों में फैल सकते हैं. 
    जिस कोरोना वायरस ने दुनिया भर में कोहराम मचा रखा है उसका वैज्ञानिक नाम SARS-CoV-2 है. फिर भी, इतना तय है कि यह वायरस जानवरों से इंसानों में आया है. जानवरों में यह वायरस ऐसी कई जेनेटिक प्रक्रियाओं से गुजरता है कि यह इंसानों को संक्रमित कर सके और उनमें तेजी से फैले.
    कोरोना वायरस चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोना वायरस से 96 प्रतिशत तक हूबहू मिलता है. लेकिन रिसर्चर इस बात से पूरी तरह से इंकार करती है कि इस वायरस को किसी प्रयोगशाला में जानबूझ कर तैयार किया गया है. इस बात के मजबूत सबूत हैं कि चीन के शहर वुहान में SARS-CoV-2 जानवरों से इंसानों में फैला है.
आखिर कोरोना वायरस को फैलाने का ज़िम्मेदार कौन है?
   ज्योतिष में 9 ग्रहों में एक ग्रह का नाम केतु है। उसको सांकेतिक दृष्टि से ऐसा दिखाया जाता है। आप देख सकते हैं कि इसमें सिर को छोड़कर बाकी सब है।
   इसका वास्तविक अर्थ है, सिर का प्रयोग न करना। जैसे जानवरों के भी सिर तो होता है पर सिर्फ भरण पोषण भर की बुद्धि होती है, उसी तरह से मनुष्यों में भी 10 प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं जिनमें जानवरों जैसी एक दिन जीने लायक बुद्धि होती है। वह भविष्य के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं।
    ऐसे ग्रह से प्रभावित व्यक्तियों को पहचानना बहुत आसान है। यह आज में जीते हैं, न भूतकाल से सीखते हैं, न भविष्य के बारे में सोचते हैं। शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति इनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है और इसके लिए यह लड़ाई, झगड़ा, मार काट कुछ भी कर सकते हैं। तर्क और समझदारी इनसे दूर होती है।
    अगर कहीं भी 9 लोग हों तो उनमें से कम से कम एक व्यक्ति केतु से प्रभावित जरूर होगा और ऐसे लोग बर्बादी लाने के माध्यम बनते हैं। जब इन्हें सत्ता मिलती है तो गृहयुद्ध शुरू हो जाते हैं और जब घर में कोई ऐसा व्यक्ति होता है तो लड़ाई, झगड़े, बंटवारा, कोर्ट कचहरी, बीमारियां आदि शुरू हो जाते हैं। बुद्धि काम न करने से यह दिशाविहीन होते हैं और बार बार असफल होते रहते हैं। समझाने पर समझने की जगह बेहद गुस्सा हो जाते हैं जिससे लोग इनसे वार्तालाप करने से बचते हैं। कई बार एक सामान्य व्यक्ति भी केतु महादशा में इसी तरह का व्यवहार करने लगता है।
    महामारी बिना केतु के सम्भव ही नहीं है और इसके फैलाव में भी केतु टाइप के व्यक्तियों का पूरा योगदान है। महामारियों का स्रोत ज्यादातर जीवजन्तु ही होते हैं। कोरोना चमगादड़ से, प्लेग चूहे से, चेचक गाय से और HIV बंदरों से मनुष्य में पहुंचा। अभी भी कोरोना की महामारी से ठीक पहले केतु का गुरु और शनि से मिलन हुआ था।
   जानवरों की तरह या तो इन्हें बांधकर रखा जाए अन्यथा जहां तहां घूमना, भरपेट खाना फिर थक कर सो जाना ही इनकी दिनचर्या होती है। इनसे मेहनत वाले, रूटीन कार्य आसानी से हो जाते हैं पर बौद्धिक, नए कार्य नहीं हो पाते हैं।
   कोरोना संक्रमण को यह तब तक मानने से इनकार करेंगे जब तक खुद अस्पताल न पहुंच जाएं। इनकी लापरवाही की वजह से ही 50 प्रतिशत कोरोना का फैलाव भी सम्भव है। भारत में हर घर, गली मोहल्ले में यह मौजूद हैं। वैसे सिवाए जानवरों जैसे कठोर उपायों के, इन्हें नियंत्रित भी नहीं किया जा सकता है।
   आपने ने सुना भी होगा हम तो डूबेगे सनम, आपको भी ले डूबेंगे कहावत इन्हीं पर बनाई गई है। सरकारें इनका कुछ नहीं कर सकतीं हैं। आप स्वयं ही इन्हें पहचाने और इनकी संगति से दूर रहें, यही इनका इलाज है ।

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