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'पहले आदिवासियों की प्यास बुझाओ, फिर कहीं और भेजना पानी' — माही नदी विवाद पर गरजे सांसद राजकुमार रोत

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'पहले आदिवासियों की प्यास बुझाओ, फिर कहीं और भेजना पानी' — माही नदी विवाद पर गरजे सांसद राजकुमार रोत

जयपुर / बांसवाड़ा /राजस्थान:

राजस्थान में पानी के बंटवारे को लेकर एक बार फिर सियासी महाभारत छिड़ गई है। भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के फायरब्रांड सांसद राजकुमार रोत ने प्रदेश की भजनलाल शर्मा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मामला माही नदी के पानी को मरुस्थलीय जिलों में भेजने की योजना से जुड़ा है, जिस पर सांसद रोत ने मुख्यमंत्री और जल संसाधन मंत्री को दो टूक शब्दों में पत्र लिखकर कड़ी आपत्ति जताई है।

सांसद रोत का साफ कहना है कि "नदियों के बीच रहकर भी आदिवासी इलाका बूंद-बूंद पानी को तरस रहा है। पानी पर पहला हक स्थानीय लोगों का है।"

Rajkumar Roat on Mahidam

क्या है पूरा विवाद? (बजट घोषणा पर आपत्ति)

राजस्थान सरकार ने अपने हालिया बजट में माही नदी बेसिन से मानसून के अतिरिक्त पानी को ट्रांसफर करने के लिए 5,900 करोड़ का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है।

  • योजना: इस अतिरिक्त पानी को फीडर कैनाल के जरिए पहले 'सोम-कमला-अंबा परियोजना' में डाला जाएगा और फिर वहां से जालौर जैसे सूखे (मरुस्थलीय) जिलों में भेजा जाएगा।

  • विरोध की वजह: सांसद राजकुमार रोत का मानना है कि स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचा तैयार किए बिना पानी को बाहर भेजना दक्षिण राजस्थान के आदिवासियों के साथ अन्याय है।

"नदियों के क्षेत्र में होकर भी क्यों प्यासे हैं आदिवासी?"

राजकुमार रोत ने सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल खड़े करते हुए कहा कि बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जैसे आदिवासी बहुल जिले पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर हैं।

"विडंबना देखिए कि दक्षिण राजस्थान की नदियों का एक बड़ा हिस्सा बिना इस्तेमाल हुए बहकर गुजरात चला जाता है। अपर्याप्त स्टोरेज और सिंचाई के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण स्थानीय किसान और ग्रामीण आज भी प्यासे हैं।" — राजकुमार रोत, सांसद (BAP)

पानी की किल्लत और मजबूरी का पलायन

सांसद ने पत्र में उन इलाकों की सूची भी सौंपी है जो हर साल गंभीर सूखे की चपेट में रहते हैं:

  • प्रतापगढ़: पीपलखूंट, अरनोद

  • बांसवाड़ा: घाटोल, कुशलगढ़, सज्जनगढ़

  • डूंगरपुर: सागवाड़ा, गलियाकोट, चिखली, सीमलवाड़ा और बिछीवाड़ा

उन्होंने जोर देकर कहा कि इन क्षेत्रों में लगातार अकाल जैसी स्थिति के कारण ही स्थानीय लोगों को रोजगार और आजीविका की तलाश में हर साल गुजरात और अन्य राज्यों की ओर पलायन (Migration) करना पड़ता है। अगर स्थानीय स्तर पर सिंचाई के साधन मजबूत हों, तो यह पलायन रुक सकता है।

BAP सांसद की प्रमुख मांगें

  1. पहला अधिकार आदिवासियों का: माही बेसिन के पानी का पहला हक स्थानीय आदिवासियों, किसानों और वहां की कृषि आवश्यकताओं का होना चाहिए।

  2. स्थानीय परियोजनाओं को मजबूती: बाहर पानी भेजने से पहले दक्षिण राजस्थान में स्थानीय सिंचाई परियोजनाओं और पेयजल आपूर्ति को पुख्ता किया जाए।

  3. किसानों की आय में वृद्धि: स्थानीय स्तर पर पानी मिलने से किसानों की आय बढ़ेगी और मजबूरी में होने वाला पलायन रुकेगा।

आगे क्या?

सांसद राजकुमार रोत की इस तीखी चेतावनी के बाद राजस्थान की सियासत गरमा गई है। अब गेंद भजनलाल सरकार के पाले में है। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह दक्षिण राजस्थान के आदिवासियों को साधने और पश्चिमी राजस्थान की प्यास बुझाने के बीच कैसे संतुलन (Balance) बनाती है।

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