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धरोहर: वागड़ के इतिहास का स्वर्णिम पन्ना है बांसवाड़ा का 'खांडू ठिकाना', जानिए इसका गौरवशाली सफर

 

धरोहर: वागड़ के इतिहास का स्वर्णिम पन्ना है बांसवाड़ा का 'खांडू ठिकाना', जानिए इसका गौरवशाली सफर

बांसवाड़ा/राजस्थान राजस्थान का इतिहास अपने आप में वीरता, त्याग और सांस्कृतिक समृद्धि की अनगिनत कहानियों को समेटे हुए है। ऐसा ही एक स्वर्णिम अध्याय दक्षिण राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में स्थित 'खांडू ठिकाना' का है। बांसवाड़ा रियासत का यह प्रमुख प्रथम श्रेणी का जागीरदार ठिकाना (फ्यूडेटरी स्टेट) सिसोदिया राजपूतों की गौरवशाली परंपरा और कुशल प्रशासनिक क्षमता का एक जीवंत प्रतीक रहा है।

आज की पीढ़ी को इस ऐतिहासिक विरासत से रूबरू कराने के लिए आइए डालते हैं खांडू ठिकाने के इतिहास, इसके शासकों और इसके ऐतिहासिक महत्व पर एक विशेष नज़र:

Khandu Thikana


18वीं शताब्दी में हुई स्थापना, मेवाड़ से जुड़ी हैं जड़ें

खांडू ठिकाने की स्थापना 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई थी। बांसवाड़ा के महारावल पृथ्वी सिंह जी (1747-1786) ने अपने द्वितीय पुत्र ठाकुर बख्तावर सिंह को यह जागीर प्रदान की थी। ठाकुर बख्तावर सिंह को आदरपूर्वक 'भाई साहिब ऑफ खांडू' कहा जाता था। वे सिसोदिया वंश की आहरा गुहिलोत शाखा से ताल्लुक रखते थे, जिनकी जड़ें मेवाड़ के शाही घराने से जुड़ी हुई थीं। बांसवाड़ा के पूर्व में स्थित इस ठिकाने में उस दौर में करीब 30 गांव शामिल थे, जिनसे सालाना लगभग 30,000 रुपये की आय होती थी। जूनियर ब्रांच होने के कारण इस ठिकाने का वार्षिक कर (ट्रिब्यूट) मात्र 400 रुपये तय किया गया था।

मराठा आक्रमणों का सामना और ब्रिटिश संधि

18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान खांडू और बांसवाड़ा रियासत ने मराठा (सिंधिया और होल्कर) आक्रमणों के कठिन दौर को देखा, जिससे क्षेत्र पर भारी आर्थिक बोझ पड़ा। इस संकट से उबरने और आंतरिक स्थिरता के लिए 25 दिसंबर 1818 को बांसवाड़ा रियासत ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि कर ली। इस पूरे दौर में खांडू के सरदारों ने न केवल बेहतरीन सैन्य कमांडर की भूमिका निभाई, बल्कि वे रियासत के मुख्य सलाहकारों में भी शामिल रहे।

महाराज रघुनाथ सिंह: मेयो कॉलेज के छात्र से स्टेट काउंसिल के सदस्य तक

खांडू ठिकाने के इतिहास में महाराज रघुनाथ सिंह का कार्यकाल बेहद खास माना जाता है। साल 1890 में अपने दादा महाराज फतेह सिंह के निधन के बाद, मात्र 8 वर्ष की अल्पायु में वे खांडू के उत्तराधिकारी बने। कम उम्र होने के कारण शुरुआत में ठिकाने का प्रबंधन बांसवाड़ा दरबार ने संभाला।

महाराज रघुनाथ सिंह ने अजमेर के प्रसिद्ध मेयो कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। वे एक कुशल प्रशासक साबित हुए और आगे चलकर खांडू के द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट बने। उन्होंने बांसवाड़ा स्टेट काउंसिल (1904-1913) और न्यायिक परिषद के सदस्य के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। उनकी प्रशासनिक वफादारी और सेवाओं के लिए उन्हें:

  • दिल्ली दरबार पदक (1903 और 1911)

  • सिल्वर जुबली मेडल (1935)

  • कोरोनेशन मेडल (1937) से सम्मानित किया गया था।

16 मार्च 1938 को उनके निधन के बाद उनके पुत्र महाराज शंकर सिंह ने इस विरासत को आगे बढ़ाया।

आजादी के बाद का बदलाव और आज का दौर

भारत की आजादी के बाद साल 1949 में बांसवाड़ा रियासत का विलय भारतीय संघ में हो गया। इसके बाद 1952 के 'राजस्थान भूमि सुधार और जागीरों के पुनर्ग्रहण अधिनियम' के तहत जागीरदारी प्रथा का अंत हुआ। हालांकि इस कानून से ठिकाने की प्रशासनिक स्वायत्तता समाप्त हो गई, लेकिन खांडू परिवार की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत आज भी उतनी ही जीवंत है।

सिसोदिया परंपरा और वफादारी के प्रतीक खांडू ठिकाने का शाही परिवार आज भी क्षेत्र के सामाजिक कार्यों और सांस्कृतिक गतिविधियों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहा है, जो वागड़ की मिट्टी के प्रति उनके गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

यह रिपोर्ट इतिहास के झरोखे से वागड़ की समृद्ध विरासत को नमन करती है।