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'चंदा उगाही' का खेल, जिसके आगे MBA भी फेल

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सच जानने की हिम्मत है? 'चंदा उगाही' का वो हुनर, जिसके आगे MBA भी फेल है!

आज एक ऐसे कड़वे सच से पर्दा उठाते हैं, जिसे हम सब रोज़ देखते हैं, महसूस करते हैं, लेकिन खुलकर बोलने की हिम्मत 99 फीसदी लोग नहीं जुटा पाते। यह सच है हमारे समाज में फल-फूल रहे एक ऐसे 'उद्योग' का, जिसे हम "चंदा उगाही" कहते हैं।

Dr. Deepak Acharya

चंदा उगाही कोई आम काम नहीं है, यह अपने आप में एक ऐसा हुनर है जो हर किसी के बस की बात नहीं। ऐसा लगता है जैसे भगवान ने हर गली-मोहल्ले और इलाके में कुछ खास लोगों को इसी 'दैवीय कार्य' के लिए धरती पर उतारा है।

मैनेजमेंट के सारे सिद्धांत यहाँ फेल हैं

साल का कोई भी महीना हो—धार्मिक आयोजन, सामाजिक उत्सव, सांस्कृतिक मेले, भागवत कथाएँ, शोभायात्राएँ या भंडारे—इनके पास आयोजनों की कभी कमी नहीं होती। इन कार्यक्रमों के नाम पर फंड जुटाने में ये लोग इतने सुपर एक्सपर्ट होते हैं कि इनके आगे बड़े-बड़े मैनेजमेंट कॉलेजों के MBA गोल्ड मेडलिस्ट भी पानी भरते नज़र आएँ। इन्हें पता होता है कि किस व्यक्ति से, किस भावना का इस्तेमाल करके, कितना पैसा निकलवाना है।

एक अघोषित नेटवर्क: हर क्षेत्र में ऐसे लोगों के कई 'समानधर्मा समूह' यानी एक ही सोच वाले गैंग अपने आप बन जाते हैं। इन्हें किसी विज्ञापन की ज़रूरत नहीं होती। जब ये चार-पाँच लोग एक साथ, चेहरे पर विनम्रता का मुखौटा ओढ़े किसी के दरवाज़े पर धमकते हैं, तो गृहस्थ बिना पूछे ही समझ जाता है कि "बलिदान" का समय आ गया है!

पराए धन पर 'परमार्थ' और पब्लिसिटी का खेल

इस पूरे खेल की सबसे दिलचस्प क्रोनोलॉजी को समझिए:

  • पैसा: जनता का

  • मेहनत: कार्यकर्ताओं की

  • प्रतिष्ठा और पब्लिसिटी: इन चंदा एक्सपर्ट्स की!

औरों से पैसा लेकर, बड़े-बड़े तंबू तानकर, ये लोग रातों-रात इलाके के 'धार्मिक कार्यकर्ता', 'परम भक्त' और 'महान समाजसेवी' बन बैठते हैं। आजकल इनका पूरा फोकस मनोरंजन से भरपूर और तड़क-भड़क वाले धार्मिक आयोजनों पर होता है, जहाँ भीड़ को खींचना आसान हो। इस खेल में कुछ 'मशहूर बाबाओं' का भी वरदहस्त इन्हें प्राप्त होता है, जिससे बाबाओं की दुकान भी साल भर चलती रहे और इन कलयुगी चंदा-प्रबंधकों की भी मुख्यधारा में तूती बोलती रहे।

तिजोरी भरी है, पर अपनी जेब से 'धेला' भी नहीं निकलेगा!

इन सफल चंदा उगाहियों की सबसे बड़ी ख़ासियत (या चालाकी) यह होती है कि इनकी अपनी जेब से एक धेला तक नहीं निकलता।

अकूत संपत्ति, शानदार बैंक बैलेंस, ब्याज की मोटी कमाई और सुख-सुविधाओं से लैस होने के बावजूद, जब खुद के अंशदान की बात आती है, तो ये 'शून्य' पर सिमट जाते हैं। असल में, सफल चंदा उगाहू की परिभाषा ही यही है—"चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए, और नाम इतिहास में दर्ज हो जाए।" अपनी इस कंजूसी और चतुराई के लिए ये लोग इंटरनेशनल अवॉर्ड के हकदार हैं।

अब वक़्त आ गया है 'मूल्यांकन' का...

यह कोई नई बात नहीं है, हमारे समाज में ऐसी टोलियों की एक लंबी और गौरवशाली (या कहें चालाक) परंपरा रही है। आपके और हमारे इलाके में आज तक जितने भी बड़े-बड़े आयोजन हुए हैं, ज़रा ठंडे दिमाग से उनका मूल्यांकन करके देखिए। आपको साफ़ समझ आ जाएगा कि दूसरों की जेब हल्की करवाकर मंच पर माला पहनने वाले इन 'नेताओं' का व्यक्तिगत योगदान क्या था।

तो अगली बार क्या करना है? अगली बार जब भी ऐसी कोई मंडली किसी रसीद कट्टे के साथ आपके दरवाज़े पर आकर खड़ी हो, तो पूरे आदर के साथ उनसे बस एक सीधा सवाल पूछिए:

"श्रीमती/श्रीमान जी, इस पावन कार्य में आपका व्यक्तिगत आर्थिक योगदान कितना है? ज़रा रसीद दिखाइए, फिर हम भी अपनी जेब ढीली करते हैं।"

विश्वास मानिए, यह एक सवाल उनके चेहरे की हवाइयाँ उड़ाने के लिए काफी होगा।

क्या आपमें इस सच को स्वीकार करने और यह सवाल पूछने की हिम्मत है? कमेंट में अपनी राय ज़रूर साझा करें!

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