बड़ी ख़बर: बैंक ऑफ बड़ौदा और NMC हेल्थकेयर के बीच 5,700 करोड़ का सेटलमेंट, सोशल मीडिया पर चर्चा तेज़
नई दिल्ली / अबू धाबी: अबू धाबी की दिग्गज हेल्थकेयर कंपनी 'NMC हेल्थकेयर' और भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख बैंक 'बैंक ऑफ बड़ौदा' (BoB) के बीच हुए एक बड़े वित्तीय समझौते ने इस समय वित्तीय बाज़ारों और सोशल मीडिया पर भारी ध्यान आकर्षित किया है। दावों के मुताबिक, बैंक ऑफ बड़ौदा ने इस दिवालिया कंपनी के साथ अदालत के बाहर समझौता (Out-of-Court Settlement) करते हुए करीब 600 मिलियन डॉलर (लगभग 5,700 करोड़ रुपये) की राशि पर सहमति जताई है।
क्या है पूरा मामला?
यूएई (UAE) की सबसे बड़ी निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता कंपनियों में से एक, NMC हेल्थकेयर के संस्थापक भारतीय मूल के व्यवसायी बी. आर. शेट्टी (B. R. Shetty) हैं। साल 2020 में इस कंपनी में करीब 4 से 5 अरब डॉलर की भारी वित्तीय धोखाधड़ी और छिपे हुए कर्ज का खुलासा हुआ था, जिसके बाद कंपनी दिवालिया घोषित हो गई थी।
इस संकट का सीधा असर उन भारतीय बैंकों पर पड़ा था जिन्होंने कंपनी को भारी लोन दे रखा था, जिसमें बैंक ऑफ बड़ौदा भी शामिल था। इस मामले को लेकर इंग्लैंड और अबू धाबी की अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई चल रही थी।
अदालत के बाहर समझौते की मुख्य बातें:
समझौते की राशि: बैंक ऑफ बड़ौदा ने कानूनी कार्यवाही को लंबा खींचने के बजाय करीब $600 मिलियन (5,700 करोड़) के सेटलमेंट के तहत अदालती मामलों को बंद करने का विकल्प चुना।
बैंक का रुख: बैंक सूत्रों और वित्तीय जानकारों के अनुसार, इस तरह के कॉर्पोरेट मामलों में कानूनी अनिश्चितता और लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों के खर्च से बचने के लिए अक्सर बैंक ऐसे सेटलमेंट का सहारा लेते हैं।
बाज़ार की प्रतिक्रिया: इस बड़ी वित्तीय गतिविधि और सेटलमेंट की खबरों के बीच शेयर बाज़ार में बैंक के शेयरों पर भी निवेशकों की प्रतिक्रिया देखने को मिली है।
विवादों और सोशल मीडिया दावों का सच
सोशल मीडिया पर इस पूरे मामले को अबू धाबी के नवनिर्मित भव्य हिंदू मंदिर और अयोध्या के श्रीराम मंदिर ट्रस्ट से जोड़कर भी देखा जा रहा है। दरअसल, बी. आर. शेट्टी यूएई के एक बेहद प्रभावशाली भारतीय प्रवासी रहे हैं और अबू धाबी में पहले हिंदू मंदिर के निर्माण की शुरुआती प्रक्रियाओं और भारत-यूएई द्विपक्षीय व्यापार मंचों में सक्रिय भूमिका में दिखे थे।
विशेषज्ञों की राय: वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि किसी व्यवसायी के सामाजिक या सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े होने का मतलब यह नहीं है कि उनके निजी बिज़नेस के फ्रॉड या बैंक सेटलमेंट का संबंध सीधे तौर पर उन धार्मिक या कूटनीतिक परियोजनाओं से है। बैंक ऑफ बड़ौदा का यह कदम पूरी तरह से एक कमर्शियल और बैंकिंग रिकवरी प्रक्रिया का हिस्सा है।
यह मामला भारत के बैंकिंग सेक्टर में बड़े एनपीए (NPA) और विदेशी धोखाधड़ी के मामलों में रिकवरी के नियमों को लेकर एक बार फिर बहस का केंद्र बन गया है।

