विशेष रिपोर्ट: राम मंदिर ट्रस्ट में 'इस्तीफों' का खेल या सिर्फ लीपापोती? जनता के 5 सुलगते सवाल
अयोध्या।। अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के बाद से जहाँ एक तरफ देश-दुनिया के श्रद्धालुओं का ताँता लगा है, वहीं दूसरी तरफ राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भीतर चल रही हलचल ने एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। हाल ही में ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारियों—चंपत राय और अनिल मिश्रा—के इस्तीफे मंजूर होने के बाद से चौराहों और चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चाओं का बाजार गर्म है।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आम जनता और रामभक्तों के बीच भारी आक्रोश है। लोग इसे केवल एक 'प्रशासनिक फेरबदल' नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों की आस्था और चढ़ावे के साथ हुए कथित खिलवाड़ को दबाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
आइए डालते हैं इस पूरे विवाद और जनता के बीच उठ रहे 5 सबसे बड़े सवालों पर एक खोजी नज़र:
1. SIT की रिपोर्ट में नाम नहीं, तो फिर इस्तीफा क्यों?
इस पूरे मामले की क्रोनोलॉजी पर जनता लगातार सवाल उठा रही है। जब एसआईटी (SIT) की जांच रिपोर्ट में कथित तौर पर मुख्य पदाधिकारियों का नाम ही शामिल नहीं है, तो फिर उनके इस्तीफे क्यों मंजूर किए गए? लोगों का आरोप है कि यह सौ साल पुराना वही पुराना मॉडल है, जहाँ बड़ी मछलियों को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बना दिया जाता है या सिर्फ पदों का फेरबदल करके जनता का गुस्सा शांत करने की कोशिश की जाती है।
2. 'नाममात्र' के कोषाध्यक्ष अचानक कैसे बने मुख्य प्रवक्ता?
विवाद का एक और दिलचस्प पहलू ट्रस्ट के भीतर पदों की अदला-बदली है। कल तक जो पदाधिकारी मीडिया के सामने यह कहते नजर आ रहे थे कि 'वे केवल नाम के कोषाध्यक्ष हैं और कोष पर उनका कोई वास्तविक अधिकार नहीं है', आज वही व्यक्ति अचानक पूरे ट्रस्ट के मुख्य प्रवक्ता बनकर फैसलों की घोषणा कर रहे हैं। इस विरोधाभास ने लोगों को हैरान कर दिया है कि जिसे कल तक अपने अधिकारों का पता नहीं था, वह आज पूरी व्यवस्था का चेहरा कैसे बन गया?
3. 'जज, ज्यूरी और जल्लाद'... सब खुद ही?
इस पूरे घोटाले के कानूनी और नैतिक पहलू पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि:
चोरी का आरोप: ट्रस्ट के प्रबंधन पर लगा।
केस दर्ज कराया: खुद ट्रस्ट ने।
जांच की सिफारिश की: खुद ट्रस्ट ने।
रिपोर्ट सौंपी गई: खुद ट्रस्ट को।
सज़ा का फैसला सुनाया: खुद ट्रस्ट ने।
विपक्ष और आम नागरिकों का कहना है कि जब खुद ट्रस्ट ही जज, ज्यूरी और जल्लाद बन बैठेगा, तो निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है? ऊपर से, हटाए गए पदाधिकारियों की जगह जिस नए व्यक्ति (कृष्णमोहन) को जिम्मेदारी सौंपी गई है, उन पर भी पहले से ही इस मामले को दबाने के आरोप लगते रहे हैं।
4. शीर्ष नेतृत्व की 'चुप्पी' पर उठते सवाल
अयोध्या के स्थानीय संतों और आम जनता में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि इतनी बड़ी कथित अनियमितता के बाद भी देश और राज्य के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया। इंटेलिजेंस यूनिट को इसकी भनक न लगना और केवल एक औपचारिक पत्र लिखकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना, भक्तों को खटक रहा है।
5. राम मंदिर: निजी जागीर या समाज की धरोहर?
आज अयोध्या के असली साधु-संत और हिंदू समाज यह मांग कर रहे हैं कि मंदिर निर्माण के बाद इसका पूरा प्रबंधन पूरी पारदर्शिता के साथ समाज या स्थानीय संतों के सुपुर्द क्यों नहीं किया गया?
दान में आए एक-एक रुपये का हिसाब सार्वजनिक (Public Domain) क्यों नहीं है?
इतनी बड़ी चूक के बाद रामभक्तों से सार्वजनिक माफी क्यों नहीं मांगी गई?
आगे का रास्ता क्या? देश के रामभक्त अब इस 'इस्तीफा पॉलिटिक्स' और लीपापोती से संतुष्ट दिखाई नहीं दे रहे हैं। जमीन पर आम राय यही बनती दिख रही है कि इस मौजूदा ट्रस्ट को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की निगरानी में एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। भगवान के खजाने और भक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ करने वाला चाहे कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसका सच सामने आना ही चाहिए।
- विशेष ब्यूरो रिपोर्ट, अयोध्या।

