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चित्तौड़गढ़ के 3 'साके': शौर्य, बलिदान और स्वाभिमान की अमर कहानी

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शौर्य, बलिदान और स्वाभिमान की अमर गाथा: चित्तौड़गढ़ दुर्ग के वो 3 'साके', जिन्होंने इतिहास को अमर कर दिया

चित्तौड़गढ़/राजस्थान।। खम्मा घणी दोस्तों! जब भी भारतीय इतिहास में वीरता, त्याग और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान का जिक्र होता है, तो मेवाड़ के सिरमौर 'चित्तौड़गढ़ दुर्ग' का नाम सबसे ऊपर आता है। इस अजेय और ऐतिहासिक दुर्ग ने अपने स्वाभिमान और धर्म की रक्षा के लिए एक-दो नहीं, बल्कि तीन ऐसे ऐतिहासिक 'साके' (Saka) देखे हैं, जिनकी गूंज आज भी फिजाओं में महसूस की जा सकती है।

Chittaurgarh Saka


क्या होता है 'साका'? जानिए राजपूती परंपरा

राजपूती परंपरा में 'साका' दो महाबलिदानों के मेल से पूरा होता है:

  1. केसरिया: जब युद्ध में जीत की उम्मीद न रहने पर वीर पुरुष 'केसरिया' वस्त्र धारण कर भूखे शेर की तरह रणभूमि में कूद पड़ते हैं और आखिरी सांस तक शत्रुओं से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होते हैं।

  2. जौहर: वहीं दूसरी ओर, वीरांगनाएं अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा के लिए धधकती अग्नि की लपटों में कूदकर खुद को इतिहास में अमर कर लेती हैं।

आइए जानते हैं चित्तौड़गढ़ के उन तीन अजर-अमर साकों के बारे में, जिन्होंने दिल्ली के सुल्तानों और मुगलों तक को झकझोर कर रख दिया था:

प्रथम साका (1303 ई.): महारानी पद्मिनी का वो ऐतिहासिक जौहर

यह चित्तौड़गढ़ के इतिहास का सबसे पहला और सबसे प्रसिद्ध साका है। जब दिल्ली के क्रूर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने दुर्ग पर आक्रमण किया, तब महाराणा रावल रतन सिंह के नेतृत्व में गोरा और बादल जैसे शूरवीरों ने अद्भुत शौर्य दिखाते हुए रणभूमि में 'केसरिया' किया। वहीं, अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए वीरांगना महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16,000 क्षत्राणियों ने धधकते अग्निकुंड में कूदकर ऐतिहासिक 'जौहर' किया। खिलजी ने किला तो जीता, लेकिन राजपूतों के स्वाभिमान को नहीं जीत सका।

द्वितीय साका (1534-1535 ई.): राजमाता कर्मवती और रावत बाघ सिंह का बलिदान

समय बदला और चित्तौड़ पर संकट का दूसरा बादल मंडराया। जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तौड़गढ़ पर भयंकर हमला किया, तब देवलिया के जांबाज रावत बाघ सिंह के नेतृत्व में राजपूत वीरों ने केसरिया बाना पहनकर अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। दुर्ग के भीतर, हाड़ी रानी राजमाता कर्मवती (कर्णावती) के नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर जौहर की पावन ज्वाला को प्रज्वलित किया।

तृतीय साका (1567-1568 ई.): जयमल-फत्ता का शौर्य और अकबर की सेना में खौफ

चित्तौड़गढ़ का तीसरा और अंतिम साका मुगल सम्राट अकबर के विशाल आक्रमण के समय हुआ। इस दौरान दुर्ग की रक्षा का भार वीर जयमल राठौड़ और फत्ता चुंडावत के कंधों पर था। इन शूरवीरों ने ऐसी भीषण वीरता दिखाई कि अकबर की विशाल सेना भी कांप उठी। मातृभूमि की रक्षा करते हुए इन्होंने हंसते-हंसते केसरिया किया। इसके बाद, फत्ता चुंडावत की पत्नी रानी फूल कंवर के नेतृत्व में हजारों वीरांगनाओं ने दुर्ग में तीसरा महान जौहर रचाया।

स्वाभिमान की गवाही देती है यह पावन माटी

चित्तौड़गढ़ की यह पावन और गौरवशाली माटी आज भी उन वीरों और वीरांगनाओं के शौर्य की गवाही देती है, जिन्होंने जीवन की नश्वरता से ऊपर उठकर अपने स्वाभिमान और मातृभूमि की आन-बान-शान को चुना। मेवाड़ के इन महान हुतात्माओं और अमर बलिदानियों को 'प्राइम न्यूज राजस्थान' का शत-शत नमन।

जय मेवाड़, जय राजपूताना!

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