अमेरिकी जज का बड़ा फैसला: अडानी के खिलाफ केस तुरंत बंद करने से इनकार, न्याय विभाग से मांगा जवाब
न्यूयार्क/नई दिल्ली।। बिजनेस टायकून गौतम अडानी और सात अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रहे कथित रिश्वतखोरी के मामले में अमेरिकी कोर्ट से एक बड़ा अपडेट आया है। एक अमेरिकी फेडरल जज ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की उस याचिका को तुरंत मंजूरी देने से इनकार कर दिया है, जिसमें अडानी के खिलाफ लगे आपराधिक आरोपों (Indictment) को खारिज करने की मांग की गई थी।
जज ने अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) को सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि वे इस हाई-प्रोफाइल मामले को अचानक बंद करने के अपने फैसले के पीछे के ठोस और वास्तविक कारणों को विस्तार से समझाएं। इसके लिए कोर्ट ने अभियोजकों (Prosecutors) को 13 जुलाई 2026 तक का समय दिया है।
"सरकारी दलीलें अधूरी और अस्पष्ट" — जज
मामले की सुनवाई कर रहे जज गराउफिस (Judge Garaufis) ने शुक्रवार को जारी अपने आदेश में सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई। उन्होंने लिखा:
"सरकार का यह संक्षिप्त, फीका और बिना किसी ठोस आधार वाला बयान अदालत को किसी नतीजे पर पहुंचने या इस अनुरोध का विश्लेषण करने का पर्याप्त अवसर नहीं देता है।"
जज ने साफ किया कि अमेरिकी न्याय विभाग कोर्ट को पर्याप्त कारण और तथ्य देने में पूरी तरह विफल रहा है। उन्होंने कहा कि बिना पूरी जानकारी के अगर अदालत इस केस को बंद करने की मंजूरी देती है, तो यह कोर्ट के अपने अधिकारों का दुरुपयोग (Abuse of Discretion) करने जैसा होगा।
क्या है पूरा मामला?
बीते 18 मई को अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने गौतम अडानी, सागर अडानी, विनीत जैन और पांच अन्य के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को वापस लेने (Dismiss with prejudice) के लिए कोर्ट में अर्जी दी थी। तब विभाग ने सिर्फ इतना कहा था कि उन्होंने मामले की समीक्षा की है और अपने विवेक से वे इस केस पर आगे और सरकारी संसाधन खर्च नहीं करना चाहते।
लेकिन जज ने 'फेडरल रूल्स ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर' के नियम 48(a) का हवाला देते हुए कहा कि इसे "सनशाइन प्रोविजन" (पारदर्शिता का नियम) कहा जाता है। इसके तहत सरकार अपनी मर्जी से केस बंद नहीं कर सकती, उसे कोर्ट को संतुष्ट करना होगा कि केस बंद करने की वजह क्या है।
अडानी के वकीलों ने दी थी 500 पन्नों की दलील
अडानी की लीगल टीम ने 24 जून को कोर्ट में 15 पन्नों का एक दस्तावेज जमा कर सरकारी याचिका का समर्थन किया था। इस फाइलिंग से खुलासा हुआ कि अडानी के वकीलों ने फरवरी से अप्रैल के बीच अमेरिकी न्याय विभाग को करीब 500 पन्नों के कानूनी तर्क, तथ्य और विशेषज्ञों की राय सौंपी थी।
इन विशेषज्ञों में हार्वर्ड लॉ स्कूल के प्रोफेसर, अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के पूर्व चेयरमैन और भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) भी शामिल थे। अडानी के वकीलों का दावा था कि अमेरिकी प्रतिभूति कानून इस मामले पर लागू नहीं होते क्योंकि यह पूरी तरह विदेशी लेनदेन था और आरोपों के पीछे कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं।
$10 बिलियन के निवेश की पेशकश की भी चर्चा
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की एक पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल में अमेरिकी न्याय विभाग के साथ हुई एक बैठक के दौरान अडानी के वकील रॉबर्ट गिउफ्रा ने आरोपों को हटाए जाने पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर (लगभग 83,000 करोड़ रुपये) के निवेश और 15,000 नौकरियां पैदा करने की पेशकश की थी। हालांकि, तब अभियोजकों ने स्पष्ट किया था कि इस प्रस्तावित निवेश का आपराधिक मामले पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
SEC के साथ हो चुका है समझौता
यह मामला नवंबर 2024 में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा शुरू की गई दो समानांतर कार्रवाइयों में से एक है। इसमें से एक मामला 'सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन' (SEC) का था, जिसके साथ अडानी समूह ने कुछ दिन पहले ही एक समझौता किया है। इस समझौते के तहत गौतम अडानी 6 मिलियन डॉलर और सागर अडानी 12 मिलियन डॉलर का नागरिक जुर्माना भरने पर सहमत हुए हैं (बिना आरोपों को स्वीकार या इनकार किए)। हालांकि, इस समझौते को भी अभी जज गराउफिस की मंजूरी मिलना बाकी है।
अब सबकी नजरें 13 जुलाई पर टिकी हैं, जब अमेरिकी न्याय विभाग को कोर्ट के सामने यह साबित करना होगा कि वे अडानी पर से केस क्यों हटाना चाहते हैं।

