चित्तौड़ के महासमर से लोक आस्था के शिखर तक: चार हाथों वाले लोक देवता श्री कल्ला जी राठौड़ की शौर्य गाथा
चित्तौड़गढ़/नागौर। राजस्थान की पावन धरा, जहाँ का हर एक कण त्याग, बलिदान और स्वाभिमान की कहानियों से जीवंत है, वहीं लोक जीवन में एक नाम अदम्य साहस और आस्था का पर्याय माना जाता है—श्री लोक देवता कल्ला जी राठौड़। जिन्हें जन-जन 'धरती धनी', 'न्याय के देवता' और 'चार हाथों वाले लोक देवता' के रूप में पूजता है, राजस्थान के प्रमुख लोक देवताओं में उनका स्थान सर्वोच्च है।
16वीं शताब्दी में नागौर के मेड़ता में राव जयमल राठौड़ और माता सौभाग्य देवी के घर जन्मे कल्ला जी में बचपन से ही क्षत्रिय धर्म और वीरता के अटूट संस्कार थे।
चित्तौड़ का तीसरा साका और अमर बलिदान
कल्ला जी के अमर बलिदान की गाथा वर्ष 1567 के चित्तौड़ के तीसरे साके से जुड़ी है। जब मुगल बादशाह अकबर की सेना ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग को घेरा, तब महाराणा उदयसिंह ने दुर्ग की रक्षा की जिम्मेदारी राव जयमल और पत्ता सिसोदिया को सौंपी। युद्ध भूमि में अपने ताऊ जयमल जी के घायल हो जाने पर, कल्ला जी ने उन्हें अपने कंधों पर बिठा लिया और दोनों हाथों में तलवारें लेकर मुगलों पर टूट पड़े।
कंधों पर सवार जयमल जी और स्वयं कल्ला जी की तलवारों के प्रहार से ऐसा दृश्य उत्पन्न हुआ मानो रणभूमि में चार हाथों वाला कोई साक्षात देवता युद्ध कर रहा हो। भीषण संग्राम के बाद वे वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनका यह अद्भुत पराक्रम इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर हो गया।
आस्था और न्याय के प्रतीक
वीरगति के पश्चात कल्ला जी को लोक देवता के रूप में पूजा जाने लगा। राजस्थान, गुजरात और मालवा क्षेत्र में इनकी अपार मान्यता है:
न्यायप्रियता: मान्यता है कि कल्ला जी के दर से कोई निराश नहीं लौटता; वे गरीबों और असहायों को न्याय दिलाते हैं।
बाधा निवारक: ग्रामीण अंचलों में माना जाता है कि कल्ला जी का स्मरण करने मात्र से ऊपरी बाधाएं और रोग-दोष समाप्त हो जाते हैं।
कृषि व जन-रक्षक: किसान अच्छी वर्षा और समृद्ध फसल की कामना के साथ कल्ला जी के थान पर धोक लगाते हैं।
प्रमुख धाम और पूजन परंपरा
चित्तौड़गढ़ किले की भैरव पोल पर स्थित कल्ला जी की छतरी अत्यंत पवित्र मानी जाती है। इसके अलावा नागौर (मेड़ता), बांसवाड़ा, डूंगरपुर और उदयपुर सहित मेवाड़ व वागड़ के लगभग हर गाँव में कल्ला जी के थान (मंदिर) स्थापित हैं। मंगलवार और शनिवार को यहाँ श्रद्धालुओं का मेला उमड़ता है, जहाँ चूरमा, नारियल और केसरिया ध्वजा अर्पित कर मनोकामनाएं मांगी जाती हैं।
मातृभूमि की रक्षा के लिए दिया गया उनका यह बलिदान आज भी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है। कल्ला जी राठौड़ केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा और जन-जन की अगाध आस्था के प्रतीक हैं।

