करोड़ों का पैकेज छोड़ झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों की तकदीर बदलने निकले कुशल चक्रवर्ती, स्थापित किया 'लोटस पेटल फाउंडेशन'
नई दिल्ली: असली दौलत बैंक-बैलेंस में नहीं, बल्कि उन चेहरों की मुस्कान में बसती है जिनकी दुनिया को आप बेहतर बना सकते हैं। इस बात को सच कर दिखाया है कुशल चक्रवर्ती ने, जिन्होंने सुख-सुविधाओं और करोड़ों के पैकेज वाली जिंदगी को पीछे छोड़कर समाज के गरीब और बेसहारा बच्चों का भविष्य संवारने का रास्ता चुना।
साल 2011 में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर चुके कुशल चक्रवर्ती एक मल्टीनेशनल कंपनी में करीब 1 करोड़ रुपये के सालाना पैकेज पर कार्यरत थे। जिंदगी हर तरह के ऐशो-आराम से भरी थी। लेकिन एक दिन अपनी बेटियों को स्कूल छोड़ने जाते समय कड़कड़ाती ठंड में बिना गर्म कपड़ों के ठिठुरते बच्चों को देखकर उनका दिल दहल गया। बुनियादी जरूरतों से महरूम उन बच्चों का मंजर कुशल के मन में एक गहरा सवाल छोड़ गया— बिना किताबों और कपड़ों के ये बच्चे आगे कैसे बढ़ेंगे?
तनख्वाह की नौकरी को मारी ठोकर, रखी नींव
इस घटना के बाद कुशल ने झुग्गी-झोपड़ियों और मजदूर बस्तियों का रुख किया। शुरुआत में कपड़े, जूते-मोजे और किताबें बांटने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि इन बच्चों का भविष्य सिर्फ राहत सामग्री से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बदलेगा।
रिश्तेदारों और समाज के तानों तथा चेतावनियों की परवाह न करते हुए कुशल ने अपनी मोटी कमाई वाली नौकरी छोड़ दी और 'लोटस पेटल फाउंडेशन' की स्थापना की।
6 बच्चों से शुरू हुआ सफर, आज हजारों को मिल रहे पंख
शुरुआत: महज एक छोटे से कमरे और 6 बच्चों के साथ पढ़ाई की शुरुआत की गई।
सुविधाएं: संस्था आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को नाममात्र फीस पर पढ़ाई, किताबें, यूनिफॉर्म, पौष्टिक भोजन और परिवहन सुविधा देती है। असमर्थ बच्चों को पूरी तरह मुफ्त शिक्षा दी जाती है।
बदलाव: आज इस पहल के जरिए हजारों बच्चे शिक्षित होकर बड़ी कंपनियों में सम्मानजनक पदों पर काम कर रहे हैं।
कुशल चक्रवर्ती ने साबित कर दिया कि दुनिया की सबसे बड़ी संपत्ति नोटों की गड्डियों में नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी संवारने से मिलने वाले सुकून में है।

