श्रद्धा और आस्था का महासमुद्र: रुणिचा धाम में उमड़ा जातरुओं का सैलाब, 125 किग्रा चांदी की मूर्ति से लेकर 80 किग्रा का घोड़ा अर्पण
बांसवाड़ा/कुशलगढ़/रामदेवरा : राजस्थान की पावन धरा, जिसे वीरों और पीरों की भूमि कहा जाता है, इन दिनों लोकदेवता बाबा रामदेव जी महाराज की भक्ति के रंग में सराबोर है। भादवा (भाद्रपद) माह के पावन अवसर पर पूरे राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में "जय बाबा री" और बाबा के जयकारों की गूंज है। सामाजिक समरसता और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बाबा रामदेव जी के दर्शन हेतु लाखों जातरू नंगे पांव, हाथों में पंचरंगी नेजा (ध्वज) थामे रुणिचा धाम पहुंच रहे हैं।
अद्भुत समर्पण: 125 किलो चांदी की मूर्ति और 80 किलो का घोड़ा
बाबा रामदेव जी के प्रति भक्तों की निष्ठा और असीम श्रद्धा का नज़ारा देखते ही बन रहा है। भक्त केवल दर्शन ही नहीं कर रहे, बल्कि अपनी मन्नतें पूरी होने पर बाबा के चरणों में अनोखे चढ़ावे अर्पित कर रहे हैं।
चांदी की मूर्ति: एक श्रद्धालु भक्त ने बाबा के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट करते हुए 125 किलोग्राम चांदी की भव्य मूर्ति दरबार में अर्पित की।
80 किलो का कपड़ा-घोड़ा: बाबा के प्रिय 'लीला घोड़े' के प्रतीक स्वरूप 22 फीट ऊंचा और 80 किलोग्राम वजनी कपड़े का निर्मित घोड़ा चढ़ाया गया।
400 किमी की कनक-दंडवत यात्रा: कई श्रद्धालु 400 किलोमीटर से भी अधिक दूरी नंगे पैर और कनक-दंडवत (पेटे चलते हुए) तय कर बाबा के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं।
नेजा और मक्का का चढ़ावा: रंग-बिरंगे ध्वज (नेजा), मिट्टी-लकड़ी के घोड़े, चादर और मक्का (ज्वार) चढ़ाकर श्रद्धालु अपनी मन्नतें पूरी कर रहे हैं।
सामाजिक समरसता के प्रतीक 'रामसा पीर'
विक्रम संवत 1466 (सन 1409) में बाड़मेर के उंडूकाश्मीर में तंवर राजपूत अजमल जी और माता मैणादे के घर जन्मे बाबा रामदेव जी को श्री कृष्ण का अवतार माना जाता है। उन्होंने समाज से छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पात के भेदभाव को समाप्त कर समरसता का संदेश दिया। मक्का से आए 5 पीरों को पर्चा (चमत्कार) दिखाकर उन्हें अपना मुरीद बनाया, जिसके बाद से हिंदू उन्हें 'भगवान रामदेव' और मुस्लिम 'रामसा पीर' के रूप में पूजते हैं।
भादवा मेला: आस्था का महासंगम
भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक चलने वाले इस विश्वप्रसिद्ध मेले में 30 से 40 लाख श्रद्धालुओं का जमावड़ा रहता है। सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करने के बाद पैरों में पड़े छाले भी भक्तों के उत्साह को कम नहीं कर पाते। रास्ते में जगह-जगह सेवाभावियों द्वारा जातरुओं के लिए जल, चाय और भंडारे (महाप्रसाद) की व्यवस्था की जा रही है।
रुणिचा धाम में उमड़ रहा यह जनसैलाब स्पष्ट करता है कि बाबा रामदेव जी का दरबार केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और अखंड विश्वास का जागृत केंद्र है, जहाँ धन-दौलत से बढ़कर भक्तों के विश्वास की पूजा होती है।



