मुखौटाधारी और नौटंकीबाज: रिटायरमेंट के बाद चोला बदलकर समाज को भ्रमित करते नए अवतार

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विशेष आलेख: मुखौटाधारी और नौटंकीबाज: सेवानिवृत्ति के बाद बदले स्वरूपों का कड़वा सच

बांसवाड़ा से लेखक डॉ. दीपक आचार्य के वैचारिक स्वर पर विशेष प्रस्तुति

समाज में कई बार ऐसे अजीब किंतु वास्तविक दृश्य देखने को मिलते हैं, जो इंसानियत और नैतिकता दोनों को झकझोर देते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी सरकारी या निजी सेवा के दौरान अपने अहंकार, भ्रष्टाचार, निकम्मेपन और संवेदनहीनता के लिए कुख्यात रहा हो, और वही व्यक्ति रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) के ठीक बाद अचानक समाज सुधारक, परम भक्त, धार्मिक अनुष्ठानकर्ता या मसीहा बनकर मंचों पर प्रकट हो जाए, तो इसे क्या कहेंगे? इसे पहचान का संकट और नए-नए अवतारों का प्राकट्य ही कहा जाएगा।

पहचान का संकट और नए अवतार: मुखौटाधारी चेहरों का कड़वा सच

सेवाकाल के काले कारनामे और रिटायरमेंट के बाद का 'पवित्र' चोला

अपने सेवाकाल के दौरान जिन लोगों ने कभी किसी गरीब, लाचार या जरूरतमंद की आह तक नहीं सुनी, जो हमेशा सत्ता की चापलूसी, दलाली, रिश्वतखोरी और अपनी धौंस जमाने में मस्त रहे, वे अचानक से समाजसेवा के ठेकेदार बन जाते हैं। पूरी नौकरी के दौरान इन्हें कभी दान-धर्म, परोपकार या लोकहित की सुध नहीं आई। लेकिन, सेवा निवृत्त होते ही ये धार्मिक संगठनों, कथाओं, सत्संगों और सामाजिक संस्थाओं में ऐसे घुसपैठ करते हैं जैसे इनसे बड़ा जनहितैषी इस धरती पर कोई और है ही नहीं।

इनकी एकमात्र और अंतिम लालसा यही बची रहती है कि जीवन के इस संध्याकाल में इन्हें बड़ा मंच मिले, भव्य आतिथ्य सत्कार हो, लंच-डिनर की दावतें मिलें और लोग इन्हें मालाएं पहनाकर जय-जयकार करें।

इनके असली 'आदर्श' और प्रेरणास्रोत: बहुरूपिया संस्कृति

इन मुखौटेधारियों और नौटंकीबाजों के इस गिरोह का चरित्र किसी से छिपा नहीं है। सवाल यह उठता है कि आखिर इन्हें इस तरह के बहुरूपिए ढोंग करने की प्रेरणा कहां से मिलती है?

इनके असली आदर्श वे तथाकथित 'नकली विश्व गुरु' या उस प्रवृत्ति के लोग होते हैं, जो खुद प्रवचनों और पाखंड के पर्दे के पीछे अपने स्वार्थों को साधते हैं। ऐसे चेहरों को देखकर ही ये नकली किरदार समाज में अलग-अलग रूप धारण करना सीखते हैं। कभी वे समाज सुधारक का चोला ओढ़ते हैं, तो कभी परमार्थ का झूठा मुखौटा पहनकर आम जनता और भोले-भाले लोगों को भ्रमित करने का गंदा खेल खेलते हैं। इनका पूरा जीवन एक बहुरुपिए की नौटंकी जैसा होता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य अपनी पुरानी काली करतूतों पर धार्मिकता और सज्जनता का पर्दा डालना होता है।

समाज की विडंबना: दासत बोध और चापलूसी

दुर्भाग्य इस बात का है कि हमारा पारंपरिक और कई मायनों में दासत्व बोध से जकड़ा समाज ऐसे दागी लोगों को भी सिर आंखों पर बिठा लेता है। बिना यह जाने कि इनका अतीत कितना दागदार रहा है, लोग इनकी आवभगत में जुट जाते हैं। ये लोग अपने जीवन की गाढ़ी कमाई से समाज के किसी गरीब या जरूरतमंद के उत्थान के लिए एक धेला खर्च नहीं करते, उल्टे समाज के संसाधनों पर मुफ्त की रोटियां तोड़ना अपना अधिकार समझते हैं।

ये बाबाओं, पण्डितों और तथाकथित धार्मिक आयोजनों का सहारा लेकर ऐसे पाखंड रचते हैं जिससे ये समाज की नजरों में एक 'महान तपस्वी' या 'नए अवतार' के रूप में स्थापित हो सकें।

ज्ञान और हुनर का सौदा

सरकारी सेवा में रहते हुए इन लोगों ने जो अनुभव, ज्ञान या प्रशासनिक कौशल प्राप्त किया था, यदि उसका उपयोग वे रिटायरमेंट के बाद समाज के गरीबों, पिछड़ों और जरूरतमंदों की निःशुल्क सेवा के लिए करते, तो शायद समाज का कुछ भला होता। लेकिन विडंबना यह है कि ये अपने उस हुनर का भी सौदा करने से बाज नहीं आते। हर जगह इन्हें अपनी कथित विशेषज्ञता के बदले मान-सम्मान और मुनाफे की दरकार होती है।

एक आत्ममंथन की जरूरत

यदि आप अपने आसपास नजर दौड़ाएंगे और ऐसे लोगों के जीवन-व्यवहार और उनकी कार्यशैली का बारीकी से अवलोकन करेंगे, तो डॉ. दीपक आचार्य द्वारा कही गई एक-एक बात सौ फीसदी सच साबित होगी। समय आ गया है कि समाज इन मुखौटाधारियों, नौटंकीबाजों और उनके वैचारिक गुरुओं की इस दोहरी चाल को पहचाने। पाखंड और दिखावे के इन नए अवतारों को स्वीकार करने के बजाय, उनके पुराने और काले इतिहास को याद रखा जाना बेहद आवश्यक है, ताकि समाज को एक बार फिर से भ्रमित होने से बचाया जा सके।

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