अलवर।। आईआईटी सेकंड ईयर का छात्र महेश बाल्मीकि पढ़ाई छोड़कर टॉयलेट साफ करने का काम करने को मजबूर है। उसने पढ़ाई करने के लिए 2.7 लाख रुपए का लोन लिया था। उसने कहा कि उसके ऊपर काफी दबाव था। लंबी बीमारी के कारण वह अपना लोन नहीं चुका पाया।एक अंग्रेजी अखबार की खबर के अनुसार, कर्ज नहीं चुका पाने के कारण महेश को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। महेश राजस्थान के अलवर में 4,000 रुपए महीने में जमादार का काम कर रहा है। थका हुआ और निराश महेश कई बार अपने दोस्तों से आत्महत्या करने की बात कहता है।इस बात को भांप कर उसके कुछ दोस्तों ने मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय से संपर्क किया। उन्होंने बीएचयू के पूर्व छात्रों की मदद से फंड जमा करके महेश का लोन चुकाने में मदद की। मगर, महेश के पिता लकवाग्रस्त हैं और उनकी मां घरों में सफाई का काम करके जीविका चला रही हैं।महेश ने सफाईकर्मी के रूप में काम करते हुए हाईस्कूल में 85 फीसद अंक हासिल किए। लंबे समय तक बीमार रहने और सफाई का काम करते हुए उसने इंटर में 70 फीसद अंक हासिल किए थे। मगर, फिर भी उसे टॉयलेट साफ करके जिंदगी बसर करनी पड़ रही है।संदीप पांडेय के मदद करने से पहले उसने अपना लोन चुकाने के लिए अपनी एक किडनी को बेचना चाहा था। इसके लिए उसने खरीदार की तलाश शुरू की। महेश का दावा है कि कोई भी उसकी किडनी को खरीदने के लिए तैयार नहीं था, क्योंकि वह दलित था।यह बात महेश ने खुद अपने दोस्तों को बताई। उसने कहा कि ब्लैक मार्केट में किडनी खरीदने से पहले लोग दान देने वाले की जाति के बारे में सवाल करते हैं। महेश ने बताया कि वह काशी और अलवर में करीब पांच अस्पतालों के च्ाक्कर लगा चुका है। उसने कहा कि डॉक्टरों ने बताया कि कोई भी मेरी किडनी नहीं लेगा, क्योंकि मैं दलित हूं।लोन नहीं चुका पाने के कारण IIT का छात्र कर रहा है टॉयलेट साफ़
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अलवर।। आईआईटी सेकंड ईयर का छात्र महेश बाल्मीकि पढ़ाई छोड़कर टॉयलेट साफ करने का काम करने को मजबूर है। उसने पढ़ाई करने के लिए 2.7 लाख रुपए का लोन लिया था। उसने कहा कि उसके ऊपर काफी दबाव था। लंबी बीमारी के कारण वह अपना लोन नहीं चुका पाया।एक अंग्रेजी अखबार की खबर के अनुसार, कर्ज नहीं चुका पाने के कारण महेश को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। महेश राजस्थान के अलवर में 4,000 रुपए महीने में जमादार का काम कर रहा है। थका हुआ और निराश महेश कई बार अपने दोस्तों से आत्महत्या करने की बात कहता है।इस बात को भांप कर उसके कुछ दोस्तों ने मैग्सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय से संपर्क किया। उन्होंने बीएचयू के पूर्व छात्रों की मदद से फंड जमा करके महेश का लोन चुकाने में मदद की। मगर, महेश के पिता लकवाग्रस्त हैं और उनकी मां घरों में सफाई का काम करके जीविका चला रही हैं।महेश ने सफाईकर्मी के रूप में काम करते हुए हाईस्कूल में 85 फीसद अंक हासिल किए। लंबे समय तक बीमार रहने और सफाई का काम करते हुए उसने इंटर में 70 फीसद अंक हासिल किए थे। मगर, फिर भी उसे टॉयलेट साफ करके जिंदगी बसर करनी पड़ रही है।संदीप पांडेय के मदद करने से पहले उसने अपना लोन चुकाने के लिए अपनी एक किडनी को बेचना चाहा था। इसके लिए उसने खरीदार की तलाश शुरू की। महेश का दावा है कि कोई भी उसकी किडनी को खरीदने के लिए तैयार नहीं था, क्योंकि वह दलित था।यह बात महेश ने खुद अपने दोस्तों को बताई। उसने कहा कि ब्लैक मार्केट में किडनी खरीदने से पहले लोग दान देने वाले की जाति के बारे में सवाल करते हैं। महेश ने बताया कि वह काशी और अलवर में करीब पांच अस्पतालों के च्ाक्कर लगा चुका है। उसने कहा कि डॉक्टरों ने बताया कि कोई भी मेरी किडनी नहीं लेगा, क्योंकि मैं दलित हूं।