विदेशों में डॉलर में बिक रहा निम का दातुन और भारतीय भाग रहे है ब्रांड के पीछे !

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     लखनऊ।। हाल ही में हल्दी की काफी के विदेशों में बिकने की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं। इस कड़ी में अब नीम का दातून भी शामिल हो गया है। देश में चौराहों, रेलवे स्टेशनों के किनारे दस रुपए के तीन बिकने वाले दातून विदेश में 668 रुपए के 6 बिक रहे हैं। ये खबरें इस ओर भी इशारा करती हैं कि कैसे भारत को अपनी प्राकृतिक चिकित्सीय पद्धतियों के व्यावसायिकरण के अधिकारों को बचाने के लिए जल्दी चेतने की ज़रूरत है।
     स्वदेशी प्रचारक राजीव दीक्षित जी के विचारों को इन्टरनेट पर फैलाने वाले हरियाणा के Rinku Kaushik ने facebook पर लिखा “अमेरिका के मॉल में नीम के दातुन बिक रहे है डॉलर में और भारत के पढ़े लिखे मूर्ख लोग स्मार्ट बनने के चक्कर मे कोलगेट, क्लोजप इस्तेमाल करके Sodium Lauryl Sulphate एवम् Flouride जैसे प्राणघातक कैमिकलों का शिकार होते जा रहे हैं और ऐसा ये सब इसलिए करते हैं क्योंकि टेलीविजीन उन्हें बताता है… धिक्कार है !” देश के जाने माने कृषि एवं खाद्य नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा ने नीम के दातून के बारे में दुनिया की सबसे मशहूर माइक्रो ब्लागिंग साइट्स में से एक ट्वीटर पर लिखा, “अजीब प्रथा है। भारतीय लोगों ने नीम की दातून इस्तेमाल करना बंद करके उसे कोलगेट से रिप्लेस कर दिया। पश्चिम को ये (दातून) काम का लगा।”
       ट्विटर पर साझा हो रही तस्वीरों में छह दातूनों की एक पैकिंग की कीमत लगभग सात डालर यानि छह सौ रुपए से भी ज्यादा दिखाई पड़ रही है। यही नहीं इंटर पर सर्च करने से कई आनलाइन स्टोर भी मिलते हैं जो विदेशों में दातून बेच रहे हैं।


     “नीम के दातून में अज़ाडेरेक्टिन (Azadirachtin) नामक प्राकृतिक रासायनिक तत्व होता है, जिसके जीवाणुओं से लड़ने की क्षमता को चिकित्सा जगत ने भी माना है। मुंह में खाने के अवशेषों के कारण सबसे ज्यादा कीटाणु पनपते हैं जो मसूड़ों और दातों से संबंधित तमाम बीमारियों का कारण बनते हैं, नीम का दातून इन सब से निपटने में कारगर है। पश्चिमी देशों ने यह बात समझ ली है” वनस्पति वैज्ञानिक डॉ दीपक आचार्य ने बताया।
    डॉ आचार्य, अभुमका प्राइवेट लि. नामक एक ऐसी कंपनी के डायरेक्टर हैं जो आयुर्वेदिक के साथ-साथ आदिवासी चिकित्सकीय ज्ञान को दवाईयों के रूप में भारतीय बाजार तक ला रहे हैं।
      हाल ही में ये खबर भी आई थी कि कैसे आस्ट्रेलिया से लेकर अमेरिका तक, विदेशों में हल्दी, बादाम, काजू और नारियल से बना पेय मशहूर हो रहा है। विदेशी लोग इसे काफी का विकल्प मानकर पीते हैं। इसके बाद भारत के प्रबुद्ध लोगों में पारंपरिक ज्ञान को बचाने की चर्चा शुरू हुई थी।

     दातून के बारे में डॉक्टर सुमन सहाय ने ट्वीट किया, “पहले हल्दी की काफी अब नीम दातून। पश्चिम देशों की भारत के बारे में खोज जारी है।”
    हाल के समय में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां भारत के पारंपरिक ज्ञान का दूसरे देशों ने व्यावसायिकरण कर दिया हो। इस बारे में डॉ दीपक आचार्य ने कहा, “कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले समय में कोई बाहरी देश नीम की दातून का पेटेंट करा ले और तब हम जागें। विदेशी अब प्राकृतिक चिकित्सीय पद्धति की उपयोगिता को समझ रहे हैं पर हम नज़रअंदाज़ करते जाते हैं, ये दिक्कत है।”
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