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राजस्थान का रियासत कालीन एक ऐसा सुंदर गांव जो उजड़ गया !

   कोटा/राजस्थान।। कोटा शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर दरा कनवास मार्ग पर अरण्य क्षेत्र में एक विशाल तालाब के किनारे स्थित पुरानी इमारतों के खंडहर बरबस ही इतिहास प्रेमियों का ध्यान खींचते हैं। चारदीवारी के अवशेषों से घिरे परिसर स्थित इमारतों के खंडहर कौतूहल और जिज्ञासा पैदा करते हैं। इस विषय मे कोटा के इतिहासविद फिरोज अहमद से जानकारी करने पर इतिहास के पन्नो में खोई एक जानकारीपूर्ण कहानी सामने आई!  
    राजस्थान के कोटा से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर दरा- कनवास मार्ग पर सड़क के किनारे पर एक पुराने उजड़े हुए गांव किशोरगंज के खंडहर स्थित हैं। इस गांव को कोटा राज्य के शासक राव किशोर सिंह प्रथम (ई० सन् 1684 से 1696) ने बसाया था। राव किशोर सिंह मुगल बादशाह औरंगजेब के दरबार में में तीन हज़ारी मनसबदार थे। इन्होंने मुगल बादशाह के लिए दक्षिण और उत्तर भारत में कई लड़ाइयां लड़ी थीं। दक्षिण में लड़ी गई मुख्य लड़ाइयां इस प्रकार थीं- बीजापुर, गोलकुंडा, हैदराबाद, इब्राहिम गढ़, रायगढ़, कर्नाटक, बसंतगढ़ आदि। उत्तर भारत में बादशाह की तरफ से भरतपुर के शासक राजाराम जाट के विरुद्ध युद्ध में भाग लेकर अपनी बहादुरी प्रदर्शित की थी। रावकिशोर ने कई युद्ध लड़े थे इनको युद्धों का अच्छा अनुभव था। राव किशोर कोटा राज्य के प्रथम शासक राव माधो सिंह (ईसवी सन् 1631 से 1648) के सबसे छोटे पुत्र थे। इनको राव माधो सिंह द्वारा 24 गांवों सहित सांगोद की जागीर मिली थी। यह अपने पिता के समय शाहजहां के दरबार में 400 के मनसबदार थे जब कोटा की राजगद्दी मिली तब 1000 के मनसबदार थे। इन्होंने अपने पिता के समय भारत की सीमाओं में बाहर मुगलों के युद्ध अभियान में बल्ख़ बदख़्शां की लड़ाइयों में वीरता प्रदर्शित की थी। अपने बड़े भाई राव मुकंद सिंह के शासन के समय कंधार के घेरे में भाग लिया था। औरंगजेब इसी समय से किशोर सिंह की वीरता और योग्यता से परिचित था। 
किशोर सिंह को कोटा राजगद्दी कैसे मिली:-
   कोटा राज्य के शासक राव माधो सिंह के निधन के पश्चात उनके बड़े पुत्र राव मुकंद सिंह कोटा के उत्तराधिकारी हुए। इनके पश्चात कोटा राजगद्दी पर इनके पुत्र राव जगत सिंह बैठे। इनके कोई पुत्र ना था इसलिए रिश्ते में बड़े ठिकाना कोयला के प्रेम सिंह को सर्वसम्मति से हाड़ा सरदारों ने कोटा की गद्दी पर बैठाया परंतु राव पेम सिंह शासन चलाने में अयोग्य साबित हुए। राज्य में हर तरफ अराजकता फैल गई। अतः विवश होकर हाड़ा सरदारों ने सांगोद के जागीरदार किशोर सिंह को कोटा की राज गद्दी पर बैठाया। राव किशोर सिंह प्रथम (ईसवी सन् 1684-96) तक कोटा के शासक रहे। यह कुशल प्रशासक कुशल सेनापति और बहुत ही बहादुर थे। जब यह सांगोद के जागीरदार थे और इनके बड़े भाई राव मुकंद सिंह कोटा के शासक थे उसी दौरान मुगल बादशाह शाहजहां सख्त बीमार पड़ा और उसके चारों पुत्रों में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष छिड़ गया। शाहजहां के बड़े पुत्र दारा शिकोह और छोटे पुत्र औरंगजेब के बीच मध्य प्रदेश के धर्मत नामक स्थान पर भयंकर युद्ध लड़ा गया। दारा शिकोह की ओर से कोटा राज्य के शासक राव मुकंद सिंह अपने भाइयों को साथ लेकर इस युद्ध में शामिल हुए इस युद्ध में औरंगजेब विजय हुआ। इस युद्ध में मुकंद सिंह अपने तीन भाइयों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। सबसे छोटा भाई किशोर सिंह इस युद्ध में बुरी तरह घायल हुए उनके चालीस घाव लगे और वह बेहोशी की हालत में डेरे पर लाया गया।
स्पर्श चिकित्सा - युवती द्वारा उपचार
    कोटा राज्य के इतिहास लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० मथुरा लाल शर्मा ने अपनी पुस्तक के भाग प्रथम में लिखा है कि धर्मत के युद्ध में सख्त जख्मी होने के बाद अचेत अवस्था में जब किशोर सिंह जी अपने डेरे में लाए गए तो उनमें प्राणों का स्पंदन मात्र था और जीवित रहने की कोई आशा दिखाई नहीं देती थी। उनकी मूर्छा को हटाने के लिए कुशल वैद्यों ने यह तजवीस( परामर्श) की कि यदि कोई युवती उनके पास रहे तो उसके स्पर्श और संसर्ग से उनकी मूर्छा का निवारण हो सकता है। उस समय एक डोड राजपूत सरदार इस शर्त पर अपनी कुमारी और युवती कन्या को किशोर सिंह जी के पास भेजने को तैयार हो गया कि स्वास्थ्य लाभ हो जाने पर उसका किशोर सिंह जी के साथ विवाह हो। उस युवती के स्पर्श से किशोर सिंह जी की मूर्छा हट गई और वे उनके पास रहने लगी। परंतु शायद ब्राह्मणों ने या सामाजिक रूढ़ियों ने उनको विवाहित पत्नी नहीं बनने दिया। कारण यह बताया गया कि विधिवत पाणिग्रहण होने से पूर्व ही उसने किशोर सिंह जी को स्पर्श कर लिया था। सांगोद के समीप स्थित कमोलर गांव के जागीरदार के वंशज इस महिला से उत्पन्न पुत्र के वंशधर कहे जाते हैं।
एक निर्माता के रूप में राव किशोर सिंह -
    इतिहासकार डॉ० मथुरा लाल शर्मा ने अपनी पुस्तक "कोटा राज्य का इतिहास" भाग प्रथम में लिखा है कि किशोर सिंह जी ने अपने शासनकाल में अपने राज्य कोटा में कितनी ही नई इमारतें, तालाब घाट और कुंड तथा बावडियां बनवाई। संवत 1750 अर्थात ईसवी सन 1693 में कोटे के परकोटे के बाहर किशोर सागर नामक तालाब की पाल की मरम्मत करवाई और किशोर विलास बाग़ लगवाया। इसी समय चंबल के किनारे पर राजघाट का निर्माण हुआ और महलों की तथा रंगबाड़ी के कोट की मरम्मत करवाई गई। किशोरपुरा मोहल्ला (वार्ड) भी इन्हीं के समय में बसा और किशोरपुरा के पुल की मरम्मत भी इसी समय हुई। इन्होंने भीलवाड़ी दरवाज़े का नाम किशोरपुरा दरवाज़ा रखा। इन्होंने मुकदमे से 6 मील के फासले पर किशोरगंज नामक एक कस्बा बसाया और उसके पास एक बड़ा तालाब बनवाया तथा महल और किले का निर्माण करवाया। वर्तमान में उजड़ा हुआ गांव किशोरगंज फॉरेस्ट विभाग के अधीन है। वर्तमान में यहां महलों के खंडहर मौजूद हैं और तालाब भी स्थित है। किशोरगंज गांव किस कारण से उजड़ा यह शोध का विषय है।


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