क्या हम मौत की सांस ले रहे है?

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क्या हम मौत की सांस ले रहे है?

जानते है फेफड़ो का हाल डॉ सुमित्रा अग्रवाल जी से
   पांच तत्वों से बना ये शरीर और जीवन जीने के लिए इन्ही पांच तत्वों का संतुलन जरुरी है। इनमे से एक तत्व है वायु। इन दिनों विशेष चर्चा में है दिल्ली और दिल्ली का प्रदूषण। वायु प्रदूषण एक प्रमुख और अत्यावश्यक सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरा है।जो अब बढ़ता चला जा रहा है कुछ तो हमारी लापरवाही है और कुछ परमाणु विस्फोट और युद्ध की वजह से। भारत में वायु प्रदूषण से हर साल लगभग २ मिलियन लोगों के मारे जाने का अनुमान है; यह भारत में पांचवां सबसे बड़ा हत्यारा है।
परिवेशी और घरेलू वायु प्रदूषण
  परिवेशी और घरेलू दोनों प्रकार का वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उद्योग, परिवहन, कोयला बिजली संयंत्र और घरेलू ठोस ईंधन का उपयोग वायु प्रदूषण में प्रमुख योगदानकर्ता हैं। २०१६ में, स्ट्रोक, हृदय रोग, फेफड़ों के कैंसर और पुरानी सांस की बीमारियों के कारण देश में अनुमानित १, ७९५,१८१ मौतों के लिए परिवेशी वायु प्रदूषण जिम्मेदार था। घरों में, वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत तंबाकू का धुआँ और ठोस ईंधन से निकलने वाला धुआँ है जिसमें अकुशल और टपका हुआ खाना पकाने के चूल्हे हैं।
२०२२ में विश्व शहरों के हवा का सर्वेक्षण-
  १,६५० विश्व शहरों के सर्वेक्षण और अगस्त २०२२ में अमेरिका स्थित स्वास्थ्य प्रभाव संस्थान द्वारा ७,००० विश्व शहरों के सर्वेक्षण के अनुसार, भारत की राजधानी दिल्ली में हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित है ।
डब्ल्यूएचओ के आंकड़े -
   डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि प्रदूषित हवा में सूक्ष्म कणों के संपर्क में आने से हर साल लगभग ७ मिलियन लोगों की मौत हो जाती है, जिससे स्ट्रोक, हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और निमोनिया सहित श्वसन संक्रमण जैसी बीमारियां होती हैं। प्रदूषकों में पार्टिकुलेट मैटर, कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड शामिल हैं।
दिल्ली में रह रहे बच्चों के फेफड़ो की चोकादेने वाली सच्चाई -
  विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में पुरानी सांस की बीमारियों और अस्थमा से मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक है। दिल्ली में, खराब गुणवत्ता वाली हवा २.२ मिलियन या सभी बच्चों के ५० प्रतिशत के फेफड़ों को अपरिवर्तनीय रूप से नुकसान पहुंचाती है।
वायु प्रदूषण से जुडी डब्ल्यूएचओ की गतिविधियाँ -
१ डब्ल्यूएचओ की गतिविधियाँ वायु प्रदूषण से जुड़े प्रभावों का जवाब देने के लिए तत्काल सार्वजनिक स्वास्थ्य की आवश्यकता को संबोधित करती हैं।
२ प्रमुख हस्तक्षेपों में नीति-निर्माताओं और जनता को अनुमेय जोखिम स्तरों और खराब वायु गुणवत्ता के स्वास्थ्य प्रभाव पर सूचित करती है।
३ वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए ज्ञान और उपकरणों के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र की निगरानी और मजबूती पर ध्यान देती है ।
भारत सरकार और प्रदूषण -
  भारत सरकार ने इस मुद्दे को व्यापक रूप से संबोधित करने के लिए परिवेशी वायु प्रदूषण के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम जैसी नीतियां भी बनाई हैं। इसके अलावा, इसने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसे कार्यक्रमों को लागू किया है ताकि घरेलू स्तर पर एलपीजी जैसे स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों तक हाशिये पर रहने वाले वर्गों तक पहुंच में सुधार किया जा सके।
Dr. Sumitra Agrawal
डॉ सुमित्रा अग्रवाल
साँस फूलना कितना है घातक  
  साँस लेने में दिक्कत होने का मतलब यह नहीं है कि कोई बीमारी जरूर ही होगी, एकाएक अधिक परिश्रम या दौड़ने भागने से भी सांस फूल जाता है, जो थोड़े समय के बाद अपने आप सामान्य हो जाता है। परन्तु सांस फूलना अपने आप में कोई बीमारी नहीं बल्कि किसी अन्य बीमारी का गम्भीर लक्षण जरूर है। इसलिए साँस फूलने की स्थिति में रोगी को चिकित्सक से तुरन्त सलाह लेनी चाहिए, ताकि वास्तविक बीमारी को जानकर उसका इलाज किया जा सके। 
साँस फूलना किसे कहते है -
  आम तौर पर हम एक मिनट में २० बार साँस लेते हैं, अगर साँस लेने की यह गति बढ़ जाये और हमें साँस लेने में दिक्कत या परेशानी महसूस होने लगे तो इसे साँस फूलना मानना चाहिए। यह स्थिति कम या अधिक गम्भीर भी हो सकती है। कुछ रोगों की कम चलने यहाँ तक की  बैठे रहने पर भी साँस फूल सकता है।
साँस फूलने से जुड़े अन्य लक्षण -
१ साँस फूलने पर कुछ लोग बताते हैं कि वह पूरा साँस नहीं ले पा रहे हैं, कुछ छाती में सिकुड़न या वजन महसूस करते हैं, तो कुछ 'सीने में जलन' से परेशान रहा करते हैं। ये सब लक्षण भिन्न-भिन्न होने पर भी वास्तव में एक ही लक्षण के विभिन्न रूप होते हैं । 
२ बायीं या दायीं तरफ लेटने से साँस फूलना हृदय रोग का लक्षण है। 
३ सांस फूलने के दौरे बार-बार पड़ें तो इसका दूसरा सम्बन्ध हृदय रोग या दमा से समझना चाहिए। 
४ अगर साँस फूलना कुछ हफ्ते से कुछ महीनों तक जारी रहे तो इसका कारण रक्त की कमी, मोटापा, गर्भावस्था, हृदय रोग या फेफड़े के किसी भाग में पानी जैसा कुछ भी हो सकता है। 
साँस फूलने के कारण -
   सांस फूलने के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे दिल की बीमारी, फेफड़े की बीमारी, चिन्ता या मानसिक तनाव, रक्त की कमी, मोटापा, पक्षाघात की बीमारी, पुरानी खाँसी, फेफड़ों में गर्द व धातुकण जमा होने से भी साँस फूलने लगता है। कैंसर पीड़ित रोगियों में साँस फूलना वर्षों तक चलता रहता है।  गुर्दे की खराबी व मधुमेह के मरीजों का अचेतन अवस्था में चले जाना इत्यादि।
एकाएक साँस का दौरा 
  अगर साँस का दौरा एकाएक पड़ जाये तो आम तौर पर इसका सम्बन्ध दिल की बीमारी, फेफड़े की बीमारी या किसी कारण साँस की नली के अवरुद्ध होने से होता है। 
रात को पड़ने वाला साँस का दौरा -
रात को पड़ने वाले दौरों का सम्बन्ध दिल की बीमारी, दमा या अधिक रक्तचाप से होता है।
साँस फूलने से सम्बंधित महत्वपूर्ण बात 
१ साँस फूल जाने मात्र से यह नहीं मान लेना चाहिए कि व्यक्ति को दिल की बीमारी हो गई है। दिल की बीमारी के रोगियों का साँस थोड़े से परिश्रम से ही फूलने लगता है जबकि स्वस्थ व्यक्ति को काफी मेहनत करने पर ऐसा होता है। 
२ हृदय रोग की भीषणता जैसे-जैसे बढ़ जाती है, वैसे-वैसे इन रोगों के रोगी का साँस थोड़े से परिश्रम से भी फूलने लगता है । 
३ बाद में ऐसी स्थिति आ जाती है जब बैठे रहने पर भी साँस फूलने लगता है। ऐसा रात में अधिक होता है। 
४ साँस की यह बीमारी नींद नहीं आने देती। फेफड़े की बीमारी के कारण अगर साँस फूलता है तो खाँसी के साथ बलगम निकल जाने पर साँस फूलने से राहत मिल जाती है।
उपचार 
  इलाज उस रोग का होना चाहिए, जिसके कारण यह स्थिति पैदा हुई है। चूँकि उसका निर्णय डॉक्टर ही कर सकते हैं अतः मेरा सुझाव है कि साँस फूलना शुरू होते ही चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।

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