जब पूर्व विधायक जोशी और पूर्व उपसभापति शेखावत ने चलती ट्रेन में तोड़ दिया था हौज पाइप
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जब पूर्व विधायक जोशी और पूर्व उपसभापति शेखावत ने चलती ट्रेन में तोड़ दिया था हौज पाइप

  उदयपुर/राजस्थान।। ‘सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे’, ‘रावण मारो काटो फेंको, मंदिर वईंज बणेगा..’, ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’, ‘बच्चा बच्चा राम का, जन्म भूमि के काम का’ ऐसे ही नारे थे जिन्होंने पूरे देश को झकझोरा था और 1990 के अक्टूबर में देश के कोने कोने से रामभक्त कारसेवा के लिए निकल पड़े थे। यह भी आभास था कि आगे उनके साथ क्या क्या हो सकता है, क्या क्या कष्ट झेलने पड़ सकते हैं, लेकिन अपने आराध्य श्रीराम के मंदिर बनाने के सपने को आंखों में संजोकर एक ही नारा गुंजा कर चल पड़े थे, ‘कारसेवा में जाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’।  
कारसेवा आंदोलन के दौरान एक सभा को संबोधित करते पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी व मंच पर बैठे गुलाबचंद कटारिया, केएल गोधा, महंत राधिका शरण, शिवकिशोर सनाढ्य व अन्य
   इन्हीं नारों के साथ उदयपुर से 1990 की कारसेवा में निकले आखिरी जत्थे में पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी और पूर्व उपसभापति महेन्द्र सिंह शेखावत ऐसे थे जिन्होंने ट्रेन रोकने के लिए चलती ट्रेन में हौज पाइप काट दिया था और ट्रेन रुकते ही भागते समय शेखावत रेलवे के कंटीले तारों में उलझ कर घायल हो गए थे, लेकिन जोश कम नहीं पड़ा था, उनके पीछे मानो रामजी का आशीर्वाद और अतुलित बलशाली हनुमानजी की ताकत लगी हुई थी। इस आखिरी जत्थे का नेतृत्व जोशी और भंवरलाल शर्मा कर रहे थे। जोशी उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महानगर कार्यवाह तथा शर्मा विश्व हिन्दू परिषद के विभाग मंत्री थे। उदयपुर से वे आखिरी जत्थे को लेकर 26 अक्टूबर को चेतक एक्सप्रेस से रवाना हुए थे। उस समय संभाग भर से इस जत्थे में शामिल होकर चेतक एक्सप्रेस में 600 कारसेवक रवाना हुए थे। स्टेशन पर तिल धरने तक की जगह नहीं थी। श्रीनाथ जी मंदिर से उत्थापन के दर्शन के बाद जत्था राम जी के काज के लिए निकला था। सभी जनरल टिकट लेकर सवार हुए। अगले दिन सुबह जयपुर स्टेशन पर चाय-नाश्ते के साथ स्वागत हुआ और दोपहर 2 बजे दिल्ली स्टेशन पहुंचने पर सूचना मिली कि कारसेवकों को अपनी पहचान हर तरह से छिपाए रखनी है। तब भोजन पैकेट और परिचय पत्र दिल्ली स्टेशन पर ही फेंक दिए गए।
   तत्कालीन विहिप विभाग मंत्री शर्मा बताते हैं कि उदयपुर से जाने वाले सभी कारसेवकों के लिए जगदीश मिष्ठान भण्डार ने भोजन पैकेट व मिठाई की व्यवस्था की थी। यह जानकारी कारसेवा के बाद बाहर आई। 1990 में दो परिवार ऐसे थे जो परिवार सहित कारसेवा में गए थे। इनमें वैद्य रामेश्वर रटलई उदयपुर व राजकुमार गुप्ता देबारी का परिवार शामिल था।
  शर्मा बताते हैं, दिल्ली से लखनऊ जाने वाली ट्रेन में हर कोई कारसेवक था, लेकिन हर कोई मौन था। इनमें राजस्थान, गुजरात और दिल्ली के कारसेवक थे। अगले दिन सुबह ट्रेन लखनऊ पहुंचने वाली थी, लेकिन दिल्ली से यूपी पुलिस को इनपुट मिला और ट्रेन को रात 11 बजे ही टुंडला स्टेशन रोक लिया गया। वहां ट्रेन निरस्त करने की सूचना दी गई। केन्द्रीय सुरक्षा बलों ने ट्रेन को घेर लिया। कुछ कार्यकर्ता इससे अचानक आक्रोशित हो उठे और टोंक के दामोदर नाम के कार्यकर्ता ने कुछ उकसाने वाली बात भी कही, लेकिन उसी समय जोशी व शर्मा हरकत में आए और संघस्थान (संघ की शाखा) पर बजाई जाने वाली विस्हल (सिटी) बजाकर सभी को प्लेटफार्म पर बिठाया और समझाया कि हमें किसी भी तरह का प्रतिकार नहीं करने के निर्देश मिले हैं। पूरी तरह अनुशासन में रहना है। इसके बाद प्रशासन ने सभी को गिरफ्तार करने की सूचना दी। स्टेशन से ले जाकर पास के कॉलेज में बिठा दिया गया और पुलिस घेराबंदी कर दी गई।
   देर रात गाड़ियां लगाकर कारसेवकों को आगरा जेल शिफ्ट किया जाने लगा। तब हमने पुलिस से सामान्य चर्चा की, कहा कि हम तो कारसेवा के लिए आए हैं, हमें अयोध्या जाना है, जेल नहीं। तब पुलिसकर्मियों ने कहा, तो आपको रोका किसने है। हमने कहा, आप बंदूक लेकर खड़े हैं। तो उन्होंने कहा, बंदूक की नली ऊपर है, आप तो नीचे से निकल सकते हैं। इसके बाद चुपचाप एक-एक कारसेवक इधर-उधर खिसककर ओझल होने लगे। स्टेशन के पास और समीपवर्ती आबादी में जाकर खो गए।
पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी व विहिप के पूर्व विभाग मंत्री भंवरलाल शर्मा
   शर्मा बताते हैं, अगले दिन की सुबह छिपे हुए कारसेवकों के लिए चौंकाने वाली थी। ग्रामीण जोर-जोर से पुकारते हुए आए कि जो भी कारसेवक हैं, वे हमारे पीछे आते जाएं। यह दृश्य भावुक करने वाला था। छिपे हुए कारसेवक एक-एक कर पीछे होते चले गए और एक स्थान पर स्नान-भोजन की व्यवस्था थी। कारसेवक इस बात को समझते हुए धन्य हो गए कि ग्रामीणों को उनके इस तरह छिपने की पूरी भनक थी और मदद की पूरी व्यवस्था की गई थी। इसके बाद ग्रामीणों ने सूचना दी आपको 11 बजे कानपुर वाली ट्रेन से निकलना है। फिर सभी अलग-अलग हुए और टिकट ले-लेकर ट्रेन में बैठे।
  पूरी ट्रेन में कुल ही 100 यात्री यानी पहचान छिपाए कारसेवक ही थे और 50 पुलिसकर्मी थे जो उन्हें टटोल रहे थे। सभी यात्री एक-एक सीट पर टांगे फैलाकर सोये। उस समय सभी सजग थे और यह तय किया हुआ था कि यदि एक भी गिरफ्तार किया जाता है तो सभी उतर जाएंगे, किसी को अकेला नहीं छोड़ना है। चूंकि, आगे इटावा स्टेशन भी था और यह तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह का क्षेत्र था, गिरफ्तारी की पूरी आशंका थी, लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई। कानपुर से पहले ही आउटर पर उतरने के बाद कारसेवकों को स्थानीय कार्यकर्ता पनकी बिजलीघर स्थित हनुमान मंदिर ले गए।
  अगले दिन सुबह पनकी हनुमानजी से स्थानीय कार्यकर्ता के साथ कारसेवक कानपुर के सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय पहुंचे। उस दिन रात को वहां सिख समाज की ओर से लंगर प्रसाद की व्यवस्था की गई थी। पग-पग पर प्रेम और सार-संभाल की व्यवस्था कारसेवकों को अचम्भित भी कर रही थी। किन्तु अभी कहानी आगे और भी मोड़ लेने वाली थी। कानपुर में अगली सुबह 30 अक्टूबर को सूचना आई कि अशोक सिंहल के नेतृत्व में कारसेवा हो गई। तब सभी गीत गाते हुए कर्फ्यू में ही निकल पड़े और उनके पीछे कानपुर के लोग जुड़ते गए। प्रशासन का मौन समर्थन नजर आया। उस दिन वहीं रुककर अगले दिन अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। लखनऊ पहुंचने पर सूचना थी कि कैंटीन के पास माथे पर गोल पट्टी बांधे जो मिलेगा, वह आपका साथी होगा। वह कार्यकर्ता स्टेशन से धर्मशाला ले गया, भोजन वहीं पर था। उसी धर्मशाला में उदयपुर से पूर्व में गए जत्थों से बिछड़े मदनलाल मूंदड़ा, लक्ष्मीनारायण कुमावत, रामदत्त आदि मिले। लेकिन, वे सभी साथ नहीं हुए, अपनी-अपनी व्यवस्था से पहुंचने का तय किया।
  शर्मा बताते हैं, हमें लगा था अब आगे सामान्य स्थिति से अयोध्या पहुंचा जाएंगे, लेकिन आगे तो कुछ और ही होना तय था। किसी ने नहीं सोचा था कि यह सफर इस जत्थे के लिए अविस्मरणीय होने वाला था और जाबांजी भरा था। 31 शाम 5 बजे लखनऊ से प्रयाग जाने वाली ट्रेन में बैठे। यह गाड़ी जगदीशपुर स्टेशन रुकती थी जो अयोध्या के पास था, योजना थी कि यहां उतरकर पैदल बढ़ेंगे, लेकिन यह क्या इस स्टेशन पर ट्रेन की गति और बढ़ गई। उस दौरान रेलगाड़ियों में चैन पुलिंग सिस्टम भी हटा दिया गया था। यहीं पर पल भर भी देर नहीं करते हुए धर्मनारायण जोशी और महेन्द्र सिंह शेखावत ने निर्णय किया और दो डिब्बों के बीच पहुंच गए और जैसे-तैसे हौज पाइप काट दिया। चलती ट्रेन में उनका यह काम आज भी हम सभी साथी कारसेवकों को रोमांचित कर देता है। ट्रेन रुकते ही सभी कूदे और निकल चले। इस दौरान महेन्द्र सिंह शेखावत कंटीले तारों में उलझ कर जख्मी हो गए।
  शर्मा कहते हैं, पता नहीं स्थानीय ग्रामीणों को कैसे भान था कि हम यहां जरूर उतरेंगे, कुछ कदम आगे बढ़ते ही ग्रामीण तैयार मिले और अंदर के रस्तों से आगे ले गए। भोजन के बाद रात को ही दो युवक लाठी और टॉर्च के साथ आगे चले और सभी को आगे वाले गांव तक छोड़ आए। यहां उलटी गंगा थी, प्रशासन की मुखबीरी ग्रामीण कर रहे थे और कारसेवकों को उनसे बचाकर सुरक्षित अयोध्या पहुंचाने की व्यवस्था कर रहे थे।
   एक नवम्बर रात तक हम अयोध्या के निकटवर्ती जौनपुर गांव पहुंचे। वहां निर्देश मिले कि अयोध्या में कर्फ्यू है और अभी आगे नहीं जाना है। रात्रि में जिस परिवार के यहां ठहराया गया, वहां की महिलाओं ने सभी से कहा कि आगे न जाएं। उन्होंने भावुक होते हुए बताया कि दो दिन पहले ही शरद और रामकुमार कोठारी इसी कमरे में ठहरे थे और उनके बलिदान की सूचना उन्हें मिल चुकी थी। उस वक्त माहौल स्तब्ध हो गया था।
   शर्मा बताते हैं कि रोमांच भरे इस आंदोलन की यादों के बीच साथी कारसेवकों का बलिदान आज भी भावुक कर जाता है। खैर, जौनपुर के बाद जब वे कर्फ्यू खुलने पर अयोध्या पहुंचे तो हनुमानगढ़ी गए। वहां पर उन्हें पता चला कि अशोक सिंहल के साथ कारसेवा के दौरान उदयपुर के भी पांच कार्यकर्ता थे जिनमें हीरालाल सोनी, हिम्मत सिंह पंवार, हरीश शर्मा, रामेश्वर छीपा, यशवंत पालीवाल शामिल थे। उन्होंने भी पुलिस की बर्बरता झेली थी। हमने वहां गोलियों के निशान देखे, सरयू पुल पर जूते-चप्पल देखे, फटे कपड़े, रक्त के धब्बे भी देखे जो राम के काज के लिए आए कारसेवकों के बलिदान की गाथा बयां कर रहे थे।
आप कारसेवक हैं, आपसे पैसे कैसे..!
  शर्मा बताते हैं कि कारसेवकों के पैसे कहीं बैग के साथ गिर गए हों या किसी जगह छूट गए हों, उन्हें इसकी कमी महसूस नहीं हुई। चाय तक के पैसे भी नहीं लगे। कदम-कदम पर सर्वसमाज कारसेवकों की सेवा में खड़ा नजर आ रहा था। कहीं चाय भी पीते तो अगले पूछते, आप कारसेवक हैं क्या, चाहे हां कहें या मौन रहें, वे समझ जाते और कहते, कारसेवकों से कैसे पैसे। गांवों में पड़ाव के बाद आगे बढ़ने पर साथ में पूड़ी-गुड़-धाणी-मसाला साथ बांधते थे, ताकि रस्ते में कोई भूखा न रहे। गांवों में ठहराने के लिए बिस्तर तो इतने थे नहीं, ऐसे में चावल की भूसी पर तिरपाल डाला जाता था और कम्बल तो कारसेवक अनिवार्यतः घर से ही साथ लेकर निकले थे। उदयपुर से गए आखिरी जत्थे में लक्ष्मीलाल चित्तौड़ा, गणेशलाल जैन लखावली, दामोदर श्रीमाल, नाथूलाल सिसोदिया आदि शामिल थे। उदयपुर से गए भारतीय मजदूर संघ के प्रमोद उपाध्याय नंगे पैर थे। शर्मा ने बताया कि उदयपुर संभाग में आंदोलन की अगुवाई महंत मुरलीमनोहर शरण शास्त्री, महंत सुरेश गिरि, केएल गोधा, राजनाथ सिंहल, माया टंडन आदि ने किया।

जय श्रीराम

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