12 साल बाद कानून का 'ऑपरेशन सुदर्शन-2': पहचान बदली, शहर बदले, पर सीआईडी की चालाकी के आगे ढेर हुआ 20 हजार का इनामी
बांसवाड़ा/जयपुर/राजस्थान।। "कानून के हाथ लंबे होते हैं और अपराध चाहे कितना भी पुराना क्यों न हो, मुजरिम एक न एक दिन सलाखों के पीछे पहुंच ही जाता है।" इस कहावत को सच कर दिखाया है राजस्थान पुलिस की सीआईडी क्राइम ब्रांच (मुख्यालय) की स्पेशल टीम ने। पुलिस ने करीब 12 वर्षों से फरार चल रहे और 20 हजार रुपये के इनामी शातिर अपराधी चिरायु गुप्ता को आखिरकार बांसवाड़ा से दबोच लिया है।
यह पूरी कार्रवाई अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (अपराध) बिपिन कुमार पाण्डेय के निर्देशन, उपमहानिरीक्षक राशि डोगरा डूडी एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नेहा अग्रवाल के सुपरविजन में चलाए जा रहे राज्यव्यापी अभियान के तहत की गई।
एक फोन कॉल और अपहरण का वो खौफनाक मंजर (साल 2014)
यह सनसनीखेज मामला साल 2014 का है। बांसवाड़ा के रहने वाले एलआईसी एजेंट मनीष संचावत को एक अनजान नंबर से फोन आया। कॉलर ने पॉलिसी करवाने के बहाने उन्हें शाम के वक्त बाबजी गार्डन के पास बुलाया। मनीष जब अपनी कार से वहां पहुंचे, तो दो युवक उनकी गाड़ी में सवार हो गए।
कुछ ही देर में बदमाशों ने मनीष की कनपटी पर पिस्तौल तान दी और कार को उदयपुर रोड की तरफ दौड़ा दिया। रास्ते में बदमाशों ने उनसे नकदी, मोबाइल और कीमती सामान लूट लिया। मौत को सामने देख मनीष ने हिम्मत दिखाई और चिड़ियावासा के पास चलती कार से छलांग लगाकर अपनी जान बचाई।
छोड़े सुराग और शुरू हुआ 12 साल का चूहे-बिल्ली का खेल
वारदात के बाद हड़बड़ाहट में बदमाश मौके पर कुछ सामान छोड़ गए थे, जिससे पुलिस ने उनकी पहचान चिरायु गुप्ता, मोहित गुप्ता और दिवेश के रूप में की। इसके बाद तीनों आरोपी अंडरग्राउंड हो गए।
फरारी काटते हुए चिरायु गुप्ता ने कई शहर बदले। वह लगातार देहरादून (उत्तराखंड) और पंचकूला (हरियाणा) में अपनी पहचान छुपाकर रह रहा था। बांसवाड़ा पुलिस ने उस पर 20 हजार रुपये का इनाम भी घोषित किया था, लेकिन वह हर बार पुलिस को चमका देने में कामयाब रहा।
मुखबिर का इनपुट और हाउसिंग बोर्ड में बिछा चक्रव्यूह
सीआईडी (सीबी) की टीम लगातार इस गैंग पर नजर रखे हुए थी। पिछले महीने ही टीम ने इस मामले के एक और इनामी आरोपी दिवेश मोर्य को देहरादून से गिरफ्तार किया था। इसके बाद उप निरीक्षक शैलेन्द्र कुमार के नेतृत्व में चिरायु को पकड़ने के लिए जाल बिछाया गया।
इसी दौरान हेड कांस्टेबल कुलदीप सिंह को पुख्ता सूचना मिली कि 12 साल से फरार चिरायु गुप्ता किसी काम से वापस बांसवाड़ा आने वाला है। तकनीकी विश्लेषण (Technical Surveillance) की मदद से इस इनपुट को वेरिफाई किया गया। सीआईडी की टीम ने बांसवाड़ा एसपी सुधीर जोशी से तालमेल बिठाया और 'ऑपरेशन सुदर्शन-2' के तहत संयुक्त घेराबंदी की। आखिरकार टीम ने हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में दबिश देकर आरोपी को धर दबोचा।
पहचान कबूली: पुलिस की गिरफ्त में आते ही आरोपी ने मान लिया कि वही रातीतलाई (बांसवाड़ा) का रहने वाला चिरायु गुप्ता है, जो फिलहाल देहरादून में छिपा हुआ था। सीआईडी ने उसे विधिक कार्रवाई के लिए कोतवाली थाना पुलिस को सौंप दिया है।
इन 'सुपरकॉप्स' की बदौलत मिली बड़ी कामयाबी
इस पूरे चक्रव्यूह को रचने और अपराधी को सलाखों के पीछे भेजने में इन अधिकारियों और जवानों की मुख्य भूमिका रही:
सीआईडी टीम: उप निरीक्षक शैलेन्द्र शर्मा, हेड कांस्टेबल बृजेश कुमार शर्मा, कुलदीप सिंह और सोहनदेव यादव (तकनीकी विशेषज्ञ), एएसआई शंकर दयाल शर्मा, हेड कांस्टेबल रविन्द्र सिंह और कांस्टेबल नरेश कुमार।
बांसवाड़ा पुलिस टीम: थानाधिकारी बुद्धाराम विश्नोई, एसआई नरेंद्र सिंह, एएसआई विशाल सिंह, हेड कांस्टेबल महिपाल सिंह, प्रकाश और लक्ष्यराज सिंह।
आगे की कार्रवाई: पुलिस अब आरोपी से गहन पूछताछ कर रही है। आशंका जताई जा रही है कि फरारी के इन 12 सालों के दौरान उसने कई अन्य राज्यों में भी वारदातों को अंजाम दिया होगा, जिसका खुलासा जल्द ही हो सकता है।

