E20 पेट्रोल का सच: मास्टरस्ट्रोक या बिना प्लानिंग के जनता की जेब पर डाका?

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E20 पेट्रोल: मास्टरस्ट्रोक या आम जनता की जेब पर बिना प्लानिंग का 'स्कैम'?

नई दिल्ली।। क्या आपने कभी सोचा है कि मकान बनाने में अगर सीमेंट-बालू का अनुपात 1:6 की जगह 1:9 कर दिया जाए तो क्या होगा? खर्च तो बेशक कम हो जाएगा, लेकिन जो घर 100 साल चलने वाला था, उसमें 10 साल में ही दरारें आ जाएंगी।

ठीक यही कहानी इस समय देश में चल रहे E20 (20% इथेनॉल मिक्स) पेट्रोल की है। सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां दावा तो कर रही हैं कि गाड़ियां E20 पेट्रोल के लिए तैयार हैं, लेकिन क्या वाकई यह ईंधन आपकी गाड़ी की उम्र आधी नहीं कर रहा है? आइए समझते हैं इस पूरे गणित और विज्ञान को, जिसे जानना हर गाड़ी मालिक के लिए बेहद जरूरी है।

E20 Petrol


क्या आपकी 2 साल पुरानी गाड़ी भी असुरक्षित है?

भारत सरकार ने साल 2021-22 में ऑटोमोबाइल कंपनियों को E20 कंप्लायंट (इथेनॉल अनुकूल) गाड़ियां बनाने का निर्देश दिया था। कंपनियों ने अरबों रुपये खर्च किए और 2023-24 के बाद से E20 गाड़ियां बाजार में उतारनी शुरू कीं।

लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि साल 2026 आते-आते पूरे देश में 20% इथेनॉल मिक्स्ड पेट्रोल अनिवार्य कर दिया गया। इसका सीधा मतलब यह है कि जो गाड़ियां मात्र डेढ़ या दो साल पुरानी हैं, वे भी इस ईंधन को झेलने के लिए पूरी तरह डिज़ाइन नहीं की गई थीं। कंपनियां भले कहें कि गाड़ी चलेगी, पर सवाल यह है कि क्या वह अपने तय वक्त (15 साल) तक बिना खराबी के चल पाएगी? जवाब है—शायद नहीं।

विज्ञान और गणित: क्यों नुकसानदेह है 20% इथेनॉल?

कक्षा 6 का गणित और विज्ञान पढ़ने वाला बच्चा भी इस बात को आसानी से समझ सकता है:

  • माइलेज में 6-7% की सीधी गिरावट: इथेनॉल, शुद्ध पेट्रोल की तुलना में 34% कम ऊर्जा (Energy) पैदा करता है। ऐसे में जब पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाया जाता है, तो गाड़ी का एवरेज (माइलेज) स्वाभाविक रूप से 6% से 7% तक कम हो जाता है।

  • सर्दियों में स्टार्टिंग की समस्या (Starting Trouble): पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल ठंड में देरी से एवपोरेट (वाष्पीकृत) होता है। नतीजा? सर्दियों के दिनों में गाड़ी स्टार्ट होने में नखरे दिखाएगी और अगर समय पर सर्विस नहीं हुई, तो रास्ते में बंद होना तय है।

  • इंजन के पुर्जों में जंग (Corrosion): इथेनॉल की एक फितरत होती है—यह हवा से नमी (आर्द्रता) सोखता है। यदि आपकी गाड़ी के पाइप, रबर और अंदरूनी कलपुर्जे पूरी तरह E20 कंप्लायंट नहीं हैं, तो नमी के कारण उनमें वैसे ही जंग और सड़न पैदा होगी जैसे समुद्र के किनारे रखे लोहे या रबर में होती है।

जेब पर डबल मार: सस्ता ईंधन, पर महंगा मेंटेनेंस

तर्क दिया जा रहा है कि नई गाड़ियों में समस्या नहीं आएगी। लेकिन 'नई गाड़ी' से तात्पर्य केवल उन गाड़ियों से है जो पिछले डेढ़-दो साल के भीतर ली गई हैं (वह भी मॉडल पर निर्भर करता है)। इसके अलावा बाकी सभी गाड़ियों के मालिकों को अब हर दो-तीन महीने में एक्स्ट्रा पैसे खर्च करके गाड़ी की सर्विस करानी होगी।

यह बिल्कुल वैसा ही है कि सीमेंट कम डालकर घर बना लिया, और अब उसे टिकाए रखने के लिए हर साल रिपेयरिंग का भारी-भरकम खर्च उठा रहे हैं। ईंधन से होने वाली कथित बचत से कहीं ज्यादा पैसा जनता को मेंटेनेंस और कम माइलेज के रूप में अपनी जेब से देना पड़ रहा है।

बिना मुकम्मल प्लानिंग का बड़ा खामियाजा!

पर्यावरण और आत्मनिर्भरता के नाम पर इथेनॉल ब्लेंडिंग का फैसला जल्दबाजी में लिया गया लगता है। बिना किसी ठोस दूरगामी प्लानिंग और पुरानी गाड़ियों के भविष्य को सुरक्षित किए बिना 20% इथेनॉल थोप देना, आम उपभोक्ता के साथ एक बड़े धोखे जैसा है।

गाड़ी आपकी है, पैसा आपका है, और अब इस 'मिक्सिंग' के खेल में होने वाले नुकसान की भरपाई भी आप ही को करनी है। क्या देश की करोड़ों गाड़ियों को दांव पर लगाकर किया जा रहा यह प्रयोग वाकई सही है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज हर वाहन चालक ढूंढ रहा है।

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