शौर्य, त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक 'कोयला ठिकाना' – कोटा रियासत का वह गौरवशाली इतिहास, जिस पर हर राजस्थानी को है नाज़
कोटा/राजस्थान।। राजस्थान की वीर धरा का इतिहास केवल किलों और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ के जर्रे-जर्रे में जाबाँजों के बलिदान की कहानियाँ दफन हैं। ऐसी ही एक अनकही और गौरवशाली गाथा है हाड़ौती के 'कोयला ठिकाना' की। कोटा रियासत के इतिहास में कोयला ठिकाने का योगदान स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। कोटा राज्य के प्रथम शासक राव माधोसिंह ने अपने चौथे पुत्र कन्हीराम को यह जागीर प्रदान की थी। राजदरबार में कोयला के जागीरदारों को न केवल सबसे पहले बैठने का सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था, बल्कि उन्हें आदरपूर्वक 'आप' की उपाधि से संबोधित किया जाता था।
⚔️ धरमत से लेकर 1857 की क्रांति तक: हर मोर्चे पर दिखाई वीरता
कोयला ठिकाने के जागीरदारों का इतिहास युद्ध के मैदानों में लहू बहाकर मातृभूमि की रक्षा करने का रहा है:
कन्हीराम का बलिदान: ठिकाने के संस्थापक कन्हीराम ने धरमत के ऐतिहासिक युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
अजबसिंह की जाँबाजी: महाराव भीमसिंह प्रथम के समय जब बूंदी के जालिमसिंह ने कोटा पर हमला किया, तब राजा की अनुपस्थिति में आप अजबसिंह ने कोटा नगर की रक्षा की। बाद में 1804 के गरोठ (इंदौर) युद्ध में वे अंग्रेजों के कर्नल मानसून की ओर से लड़ते हुए गंभीर रूप से घायल हुए।
1857 की क्रांति में मुकाबला: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) के दौरान आप अजीतसिंह और उनके काका सरदारसिंह ने क्रांतिकारियों का डटकर सामना किया। बागियों ने सबसे बड़ा हमला 'कोयला की हवेली' पर किया था, लेकिन जागीरदारों ने अपनी वीरता से इसे विफल कर दिया।
18 गाँवों की जागीर और 153 घुड़सवारों की सेना:
महाराव उम्मेदसिंह प्रथम के काल में आप भगोतसिंह के पास 18 गाँवों की जागीर थी और राज्य की सुरक्षा के लिए वे हमेशा 153 घुड़सवारों की फौज तैयार रखते थे।
जनरल 'राय बहादुर' गोविन्दसिंह: तलवार के धनी और क्रिकेट के उस्ताद
कन्हीराम की दसवीं पीढ़ी में जन्मे आप गोविन्दसिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कोटा राज्य की सेना में जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) के पद तक पहुँचे और सेना का आधुनिक पुनर्गठन किया। उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें 'राय बहादुर' की उपाधि दी।
सैन्य कौशल के साथ-साथ वे एक बेहतरीन क्रिकेटर भी थे। मेयो कॉलेज की ओर से खेलते हुए 10 सितंबर 1904 को उन्होंने नसीराबाद जिमखाना के खिलाफ नाबाद 142 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली थी। उनके गगनचुंबी छक्के उस दौर में बेहद मशहूर थे। वे महाराजा उम्मेदसिंह के साथ दिल्ली में जॉर्ज पंचम के राजतिलक दरबार में भी शामिल हुए थे। मात्र 2 अप्रैल 1929 को अल्पायु में उनके निधन से कोटा दरबार ने अपना एक महान रत्न खो दिया।
लोकतंत्र में भी रहा अहम योगदान
समय बदला, देश आज़ाद हुआ और राजशाही की जगह लोकतंत्र ने ली। यहाँ भी कोयला ठिकाने ने अपनी भूमिका निभाई। ग्यारहवीं पीढ़ी के आप रघुराजसिंह वर्ष 1948 से कोटा नरेश के मिलिट्री सचिव रहे और बाद में वर्ष 1952 से 1957 तक राजस्थान विधानसभा के सदस्य (MLA) बनकर जनता की सेवा की।
निष्कर्ष:
कोयला ठिकाने के जागीरदारों ने पीढ़ियों तक अपनी तलवार, कलम और प्रशासनिक क्षमता से कोटा राज्य की सेवा की। आज भी हाड़ौती के इतिहास में कोयला ठिकाने का नाम निष्ठा, वीरता और स्वाभिमान के सर्वोच्च शिखर के रूप में आदर के साथ लिया जाता है।
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