जब जलझूलणी ग्यारस पर भैरव तांत्रिक के दावे के ठीक 3 बजे बदला आसमान का मिज़ाज

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देवझूलणी एकादशी पर जब सूखा पड़ा राजतालाब, चंद घंटों में उफन पड़ा: बांसवाड़ा की एक अलौकिक अमर गाथा

बांसवाड़ा : वागड़ अंचल की पावन धरा हमेशा से अलौकिक सिद्धियों और अटूट जन-आस्था की गवाह रही है। रियासतकाल की एक ऐसी ही विस्मयकारी घटना आज भी बांसवाड़ा के इतिहास में गर्व और श्रद्धा के साथ याद की जाती है, जब जलझूलणी (देवझूलणी) ग्यारस पर एक ओर तो पूरा तालाब सूखा पड़ा था, वहीं दूसरी ओर महज़ कुछ घंटों के भीतर ऐसा चमत्कार हुआ कि पूरा राजतालाब लबालब भर गया।

45 मिनट की बारिश और लबालब राजतालाब: बांसवाड़ा के सिद्ध साधक की एक विस्मयकारी कथा

जब परंपरा पर मंडराया संकट

बात दशकों पुरानी रियासतकालीन दौर की है। उस वर्ष बांसवाड़ा में नाममात्र की बारिश हुई थी और पूरे क्षेत्र में सूखे के बादल मंडरा रहे थे। इसी बीच जलझूलणी एकादशी का पावन पर्व आ पहुंचा। बांसवाड़ा की सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, शहर के विभिन्न मंदिरों से ठाकुरजी की भव्य रामरवाड़ियां (देवरवाड़ियां) निकलकर धार्मिक विधि-विधान और जलाभिषेक के लिए राजतालाब पहुंचती थीं।

लेकिन इस बार राजतालाब में पानी की एक बूंद तक नहीं थी। परंपरा के टूटने के डर से तत्कालीन महाराजा गहरी चिंता में डूब गए। भक्त निराश थे और मंदिरों के पुजारी हैरान-परेशान। जब कोई रास्ता नजर नहीं आया, तो एक दरबारी पंडित के सुझाव पर महाराजा स्वयं एकादशी की सुबह शहर के क्षेत्रपाल क्षेत्र में रहने वाले एक सिद्ध भैरव तांत्रिक के निवास पर पहुंचे। महाराजा ने उनसे अपनी व्यथा साझा करते हुए परंपरा की रक्षा का मार्ग निकालने की गुहार लगाई। सिद्ध तांत्रिक ने राजा को आश्वस्त करते हुए कहा, "भगवान भैरवनाथ पर भरोसा रखें, शाम 3 बजे के बाद ईश्वर का चमत्कार देखिएगा।"

3 बजते ही बदला आसमान का मिज़ाज

राजा महल लौट आए, लेकिन अपराह्न ढाई बजे तक आसमान में दूर-दूर तक बादलों का नामोनिशान नहीं था। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, राजा और प्रजा की धड़कनें तेज हो रही थीं।

लेकिन ठीक तीन बजते ही खुले आसमान के एक कोने में बादल का एक छोटा सा टुकड़ा दिखाई दिया। देखते ही देखते अगले 10 से 15 मिनटों के भीतर पूरा गगन काले और पानी से लदे घने मेघों से पट गया।

मूसलाधार बारिश और लबालब भरा राजतालाब

इधर शाम चार बजे के करीब जब राजतालाब के लिए राजा की पारंपरिक सवारी निकली, तभी अचानक बादलों की गड़गड़ाहट के साथ ऐसी मूसलाधार बारिश शुरू हुई मानो गगन की नदियां धरती पर उतर आई हों। कुछ ही देर में पूरा शहर जलमग्न हो गया। महज आधे से पौने घंटे की घनघोर वर्षा से सूखा राजतालाब पूरी तरह भर गया और स्थिति तालाब के टूटने तक आ पहुंची, जिसके बाद पाल से वैकल्पिक रास्ता बनाकर अतिरिक्त पानी की निकासी की गई।

बारिश इतनी तेज थी कि महालक्ष्मी चौक पहुंची राजा की सवारी पानी के तेज बहाव में घिर गई और कड़ी मशक्कत के बाद आगे के धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए जा सके।

राजा ने बनवाया तांत्रिक का आवास

इस भारी बारिश के कारण उस सिद्ध तांत्रिक का कच्चा मकान ढह गया था। चमत्कार से अभिभूत और कृतज्ञ होकर महाराजा ने तांत्रिक के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उनके ध्वस्त मकान का पक्का निर्माण करवाया।

सिद्धों की भूमि रही है वागड़ धरा

इस घटना का विस्तृत विवरण प्राच्यविद्यामहर्षि (ब्रह्मलीन) पंडित श्री महादेव शुक्ल जी ने साझा किया था, जो बाद में उसी स्थान और मकान में रहे जहां कभी वह सिद्ध तांत्रिक निवास करते थे। बांसवाड़ा की यह ऐतिहासिक और चमत्कारिक घटना आज भी प्रमाण है कि वागड़ की इस पावन माटी में एक से बढ़कर एक सिद्ध साधक और तांत्रिक रहे हैं, जिनकी भक्ति और साधना ने समय-समय पर इतिहास रचने का काम किया।


आलेख: डॉ. दीपक आचार्य

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