गाँव की मिट्टी से निकलकर मुकाम तक: फतेह हॉस्टल उदयपुर की तीन ग्रामीण प्रतिभाओं का 'प्रेरक संगम'
90 के दशक की 'प्रतिभा खोज' व्यवस्था को पुनः जीवित करने की उठी मांग; दूरस्थ क्षेत्रों के किसान-मजदूर परिवारों के बच्चों के लिए विशेष छात्रावास शुरू करने की अपील
बांसवाड़ा/उदयपुर। 1990 के दशक में तत्कालीन सरकार द्वारा संचालित प्रतिभावान छात्रावास योजना किस प्रकार ग्रामीण अंचल की दिशा बदल सकती थी, इसका जीवंत उदाहरण हाल ही में उदयपुर के ऐतिहासिक फतेह सीनियर सेकेंडरी विद्यालय एवं छात्रावास (फतेह हॉस्टल) से जुड़ी एक सुखद तस्वीर में देखने को मिला। कभी अनुसूचित क्षेत्र के अलग-अलग गाँवों से आकर एक ही हॉस्टल में साथ रहने, पढ़ने और अनुशासन का पाठ सीखने वाले तीन सहपाठियों का आत्मीय मिलन आज समाज के लिए एक प्रेरणादायक क्षण बन गया।
एक तस्वीर, अनेक यादें और सफलता की तीन मिसालें
किसान और मजदूर परिवारों की पृष्ठभूमि से निकलकर अपनी लगन के बल पर अलग-अलग क्षेत्रों में पहचान बनाने वाले ये तीनों व्यक्तित्व आज प्रशासनिक, चिकित्सा और शैक्षणिक सेवाओं में समाज को अपनी सेवाएँ दे रहे हैं:
डॉ. दिनेश चंद्र जी खराड़ी (मूल निवासी: डूंगरपुर) – वर्तमान में CMHO, सिरोही के पद पर कार्यरत।
श्री गौतम लाल जी कटारा (मूल निवासी: बागीदौरा) – वर्तमान में ADEO, बांसवाड़ा के पद पर जिम्मेदारियों का निर्वहन।
डॉ. कन्हैयालाल खांट (मूल निवासी: गढ़ी) – वर्तमान में सहायक आचार्य (इतिहास), श्री गोविंद गुरु राजकीय महाविद्यालय, बांसवाड़ा।
छात्रावास जीवन में मिली आत्मनिर्भरता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सामाजिक समरसता की बदौलत आज ये तीनों अपनी-अपनी भूमिकाओं में क्षेत्र के विकास में अग्रणी योगदान दे रहे हैं।
क्यों महसूस हो रही है 'ग्रामीण प्रतिभा खोज' को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता?
इस आत्मीय मिलन के दौरान एक अत्यंत गंभीर और प्रासंगिक विषय पर भी मंथन हुआ। 90 के दशक में कक्षा 8वीं के बाद एक विशेष परीक्षा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक प्रतिभाओं का चयन कर उन्हें जिला मुख्यालयों के विशेष छात्रावासों में पढ़ने का अवसर मिलता था।
आज केवल अंकों के प्रतिशत के आधार पर मिलने वाले प्रवेश प्रक्रिया के कारण दूरस्थ अंचलों के कई मेधावी छात्र पीछे छूट जाते हैं। इसलिए, वास्तविक क्षमता वाले बच्चों की पहचान कर उन्हें बेहतर माहौल देने के लिए इस पुरानी और प्रभावी व्यवस्था को फिर से शुरू करना बेहद जरूरी है।
राज्य सरकार और TAD (जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग) से मुख्य अपेक्षाएँ:
जनजाति अंचल के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान राज्य सरकार और TAD विभाग से निम्नलिखित माँग रखी गई है:
विशेष परीक्षा का आयोजन: कक्षा 5वीं या 8वीं के बाद ग्रामीण स्तर पर प्रतिभा खोज परीक्षा पुनः शुरू की जाए।
प्रतिभा छात्रावासों की शुरुआत: प्रत्येक जिले में ग्रामीण प्रतिभाशाली बालक-बालिकाओं के लिए पृथक हॉस्टल संचालित किए जाएँ।
ज़रूरतमंदों को प्राथमिकता: दूरस्थ किसान व मजदूर परिवारों के प्रतिभावान बच्चों को इसमें विशेष प्राथमिकता मिले।
सर्वांगीण विकास का माहौल: शिक्षा के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, नेतृत्व और अनुशासन का वातावरण दिया जाए।
"प्रतिभा गाँव में भी उतनी ही होती है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने, अवसर देने और सही दिशा दिखाने की है।"
— डॉ. कन्हैयालाल खांट
(पूर्व छात्र, फतेह हॉस्टल उदयपुर [1996-2000] एवं सहायक आचार्य, बांसवाड़ा)
संदेश:
फतेह हॉस्टल की यह तस्वीर मात्र तीन दोस्तों की मुलाकात नहीं, बल्कि उस दूरदर्शी शैक्षणिक व्यवस्था की मिसाल है जिसने गाँव की माटी से हीरे तराशे थे। यदि आज फिर से ग्रामीण प्रतिभाओं को सही मंच और मार्गदर्शन मिले, तो वे देश के हर क्षेत्र में नई ऊँचाइयों को छू सकती हैं।
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