जोगडीमाल में लोक देवता वीर कल्ला जी राठौड़ का 9 दिवसीय ज्वारे-जागरण महोत्सव संपन्न: जानें 'चार हाथों वाले देवता' का इतिहास और परंपराओं का महत्व
कुशलगढ़ (बांसवाड़ा)। राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ उपखंड क्षेत्र के खेड़ा धरती घाटा क्षेत्र स्थित कोटड़ा पंचायत के गांव जोगडीमाल में श्री कल्ला जी राठौड़ मंदिर पर नौ दिवसीय ज्वारे एवं जागरण महोत्सव का श्रद्धा और उल्लास के साथ आयोजन किया गया। पुजारी कल्लूमल महाराज ने बताया कि इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।
इस अवसर पर राष्ट्रीय सनातन मानव धर्म रक्षा संघ के राष्ट्रीय प्रमुख संत नरसिंह गिरी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म में हर परंपरा के पीछे विज्ञान, आस्था और मानव कल्याण का गहरा संदेश छिपा है। संघ लुप्त होती परंपराओं को फिर से जीवित करने के लिए संकल्पबद्ध है।
कौन थे लोक देवता वीर कल्ला जी राठौड़ और क्यों बनते हैं पूजनीय?
महोत्सव के दौरान कल्ला जी महाराज के महिमामयी इतिहास और उनके लोक देवता बनने की गाथा पर भी प्रकाश डाला गया:
कौन थे वीर कल्ला जी?
वीर कल्ला जी राठौड़ (वीर कल्लाजी) का जन्म मारवाड़ के सामियाना गांव में हुआ था। वे मेड़ता के राव जयमल के भतीजे और प्रसिद्ध भक्त शिरोमणि मीराबाई के भतीजे (भतीजे समान रिश्तेदार) थे। वे अद्भुत योद्धा, सिद्ध पुरुष, योग साधना एवं आयुर्वेद/जड़ी-बूटियों के प्रकांड विद्वान थे।
चार हाथों वाले देवता (लोक देवता/भगवान कैसे बने?):
सन 1568 में चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके के दौरान मुग़ल सम्राट अकबर की सेना के खिलाफ लड़ते हुए जब उनके चाचा राव जयमल घायल हो गए, तब कल्ला जी ने उन्हें अपने कंधों पर बिठा लिया। दोनों हाथों में अपनी तलवार और दोनों हाथों में चाचा जयमल की तलवारें लेकर उन्होंने ऐसा प्रचंड युद्ध लड़ा कि शत्रु सेना दंग रह गई। दो सिर और चार हाथों वाले इस अद्भुत रण-कौशल के कारण उन्हें "चार हाथों वाले लोक देवता" के रूप में ख्याति मिली। मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करने और उनके अद्भुत चमत्कारों के कारण उन्हें ईश्वर तुल्य मानकर पूजा जाने लगा।
कल्ला जी के मुख्य कार्य व लोक कल्याण:
वीर कल्ला जी ने जीवनभर दीन-दुखियों की सेवा की, मुगलों के अत्याचारों से सनातन धर्म और मातृभूमि की रक्षा की तथा अपनी सिद्धियों व आयुर्वेद ज्ञान से रोगियों का उपचार किया। आज भी उनके धाम पर शारीरिक-मानसिक कष्टों एवं सर्पदंश से पीड़ित लोगों का कल्याण होता है।
वाड़ी विसर्जन, ज्वारे और निशान: सनातन मानव धर्म के तीन मुख्य स्तंभ
राष्ट्रीय सनातन मानव धर्म रक्षा संघ के अनुसार वाड़ी विसर्जन, ज्वारे और निशान केवल पूजन सामग्री नहीं, बल्कि त्याग, अन्न और विजय के प्रतीक हैं:
1. वाड़ी विसर्जन - अहंकार का विसर्जन
वनवासी कल्याण परिषद के जिलाध्यक्ष बहादुर डामोर एवं संतों ने बताया कि 'वाड़ी' का अर्थ देह है और इसके विसर्जन का अर्थ अहंकार का विसर्जन है। नवरात्रि में मिट्टी की वाड़ी में बोए गए जौ के अंकुरों को विसर्जित करते हुए भक्त अपनी बुराइयों, क्रोध और लोभ को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने का संकल्प लेता है। वागड़ क्षेत्र में मान्यता है कि इससे पितृ दोष व भूमि दोष शांत होते हैं।
2. ज्वारे - 'अन्न ही ब्रह्म है' का संदेश
संत गिरधारी महाराज और शंकर महाराज (सज्जनगढ़, खुंदनी) ने बताया कि ज्वारे साक्षात अन्नपूर्णा देवी का स्वरूप हैं। शास्त्रों में कहा गया है - 'अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्'। जौ सृष्टि का पहला अन्न है। हरा व घना ज्वारा सुख-समृद्धि का प्रतीक है। संघ युवाओं को खेती, प्रकृति और अन्न के सम्मान से जोड़ने के लिए ज्वारे रोपण को बढ़ावा दे रहा है। दशहरे पर बुजुर्गों द्वारा दिया जाने वाला ज्वारा समृद्धि का आशीर्वाद है।
3. निशान - धर्म की विजय पताका
गिरधारी महाराज (मोरनदी) ने बताया कि निशान (केसरिया ध्वजा) सनातन धर्म की विजय और रक्षा का प्रतीक है। निशान पर अंकित त्रिशूल या 'ॐ' अधर्म, पाखंड और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने के संकल्प को दर्शाता है। आदिवासी क्षेत्रों में निशान यात्रा से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सामाजिक एकता सुदृढ़ होती है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय सनातन मानव धर्म रक्षा संघ का मानना है कि वाड़ी विसर्जन हमें अहंकार त्यागना सिखाता है, ज्वारे अन्न व प्रकृति का आदर सिखाते हैं और निशान धर्म की रक्षा के लिए एकजुटता का संदेश देता है। पाश्चात्य संस्कृति और प्रदूषण के दौर में इन पारंपरिक मूल्यों का संरक्षण ही हमारी सनातन सभ्यता की रक्षा का मार्ग है।

