पर्यावरण संरक्षण के लिए आचार्य डॉ. लक्ष्मण लाल परमार को मिला 'प्रकृति पुरस्कार', अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमका कुशलगढ़ का नाम
कुशलगढ़ (बांसवाड़ा)। शिक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बांसवाड़ा जिले की प्रतिभाएं अब वैश्विक पटल पर पहचान बना रही हैं। मामा बालेश्वर दयाल राजकीय महाविद्यालय, कुशलगढ़ के भूगोल विभागाध्यक्ष आचार्य डॉ. लक्ष्मण लाल परमार को पर्यावरण संरक्षण एवं जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिष्ठित ‘पर्यावरण जागरूकता प्रकृति पुरस्कार’ तथा ‘श्रेष्ठ प्रदर्शन शील्ड’ से सम्मानित किया गया है।
यह गरिमामय सम्मान 23 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में आयोजित दो दिवसीय द्वितीय अंतरराष्ट्रीय प्रकृति सम्मेलन के दौरान प्रदान किया गया। इस खबर के सामने आते ही कुशलगढ़ सहित पूरे वागड़ क्षेत्र में हर्ष की लहर दौड़ गई है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखा वागड़ की प्रतिभा का सम्मान
यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शासकीय माधव कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय (उज्जैन) तथा प्रकृति शोध सोसायटी (उदयपुर) के संयुक्त तत्वावधान में 23 एवं 24 अक्टूबर 2026 को आयोजित किया गया। सम्मेलन में भारत एवं विदेशों के सैकड़ों पर्यावरणविद्, भूगोलवेत्ता और शोधकर्ता एकत्र हुए।
अध्यक्षता: महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. कल्पना वीरेंद्र सिंह।
मुख्य अतिथि: भारतीय सर्वेक्षण विभाग, कोलकाता के पूर्व अध्यक्ष प्रो. पृथ्वीश नाग।
मार्गदर्शन: प्रकृति शोध सोसायटी के संस्थापक व जाने-माने पर्यावरणविद् डॉ. पी. आर. व्यास।
जब मंच से डॉ. लक्ष्मण लाल परमार के नाम की घोषणा हुई, तो पूरा सभागार करतल ध्वनि से गूंज उठा। मुख्य अतिथि प्रो. पृथ्वीश नाग ने अपने कर-कमलों से डॉ. परमार को प्रकृति पुरस्कार, शील्ड एवं प्रशस्ति पत्र सौंपकर अलंकृत किया।
25 वर्षों की अविरल सेवा: पर्यावरण के सच्चे प्रहरी हैं डॉ. परमार
डॉ. लक्ष्मण लाल परमार का मानना है कि ‘भूगोल केवल किताबों का विषय नहीं, बल्कि इस धरती को गहराई से समझने का विज्ञान है।’ पिछले 25 वर्षों से वे लगातार धरातल पर उतरकर पर्यावरण संरक्षण के संकल्प को साकार कर रहे हैं:
सघन वृक्षारोपण: कॉलेज परिसर एवं आसपास के इलाकों में सैकड़ों पौधे रोपने के साथ छात्रों को उनके पोषण और देखभाल का जिम्मा सौंपा।
जल संरक्षण अभियान: वागड़ अंचल में जल संकट की गंभीरता को देखते हुए कार्यशालाओं के ज़रिये पारंपरिक जल स्रोतों के पुनरुद्धार की मुहिम चलाई।
शोध एवं नवाचार: वागड़ क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और वनस्पति पर कई शोध-पत्र लिखे, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।
छात्र जागरूकता: हर साल छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान देने हेतु फील्ड सर्वे पर ले जाना, ताकि वे जमीनी स्तर पर पर्यावरणीय चुनौतियों को समझ सकें।
क्यों खास है यह सम्मान?
प्रकृति शोध सोसायटी (उदयपुर) द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह पुरस्कार उन विभूतियों को दिया जाता है जो कागजी दावों से इतर धरातल पर बदलाव लाते हैं। चयन समिति ने आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए डॉ. परमार द्वारा जगाई गई चेतना को विशेष रूप से सराहा।
"यह सम्मान कुशलगढ़ की माटी और मेरे विद्यार्थियों का है"
पुरस्कार प्राप्त करने के बाद डॉ. परमार ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा:
"यह सम्मान मेरा व्यक्तिगत नहीं, बल्कि मेरे छात्रों और कुशलगढ़ की पावन धरा का है। पर्यावरण को बचाना हम सभी का नैतिक दायित्व है। यदि हमने आज अपनी धरती की रक्षा नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। मैं इस पुरस्कार को वागड़ की प्रकृति को समर्पित करता हूं।"
इस उपलब्धि पर कॉलेज प्रशासन, प्राध्यापकों, स्थानीय प्रबुद्धजनों और विद्यार्थियों ने उन्हें बधाई दी है। एक छोटे शहर के शिक्षक का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित होना संपूर्ण बांसवाड़ा जिले के लिए गर्व का विषय है।

