मुनाफ़े के खेल में पाकिस्तानी डिग्री भारत में स्वाहा हो गई

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मुनाफ़े के खेल में पाकिस्तानी डिग्री भारत में स्वाहा हो गई

पाकिस्तान की डिग्री भारत में मान्य नहीं होगी, इस तरह के फैसले के क्या परिणाम होंगे?
  पाकिस्तान की डिग्री भारत में मान्य नहीं होगी इसका भारत के अन्य हिस्सों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा सिवाय जम्मू कश्मीर के, ये फैसला भी उसी के मद्देनजर लिया गया है।  
मेडिकल और इंजीनियरिंग सीटों को बेचकर कमाते थे मुनाफा
  दरअसल कश्मीर घाटी का अलगाववादी संगठन हुर्रियत और उसके नेता रहे सैय्यद अली साह जिलानी और भी दूसरे अलगाववादी नेता कश्मीरी छात्रों के लिए पीओके और पाकिस्तान में रिजर्व मेडिकल और इंजीनियरिंग सीटों को बेचकर मुनाफा कमाते रहे हैं।
पाकिस्तान के मेडिकल कॉलेज रैकेट में शामिल होने का हुआ था खुलासा 
  सैयद अली शाह गिलानी के इस्तीफे और अंदरूनी कलह के बाद हुर्रियत नेताओं पर पाकिस्तान के मेडिकल कॉलेज रैकेट में शामिल होने का खुलासा हुआ था। हुर्रियत नेता कश्मीरी छात्रों के लिए पीओके और पाकिस्तान के रिजर्व मेडिकल इंजीनियरिंग की सीट बेचते थे।
अधिकतर सीटें पाकिस्तान सरकार करती थी स्पॉन्सर 
  दरअसल पाकिस्तान की ये रिजर्व सीटें UN छात्रों के लिए मुहैय्या कराई जाती थी जिनके पैरेंट्स या कमाई करने वाले सदस्य की जम्मू कश्मीर में हिंसा के दौरान मौत हो जाती थी। जिन कश्मीरी छात्रों को स्थानीय कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलता था वो पाकिस्तान का रुख करते थे। अधिकतर सीटें पाकिस्तान सरकार स्पॉन्सर करती थी।  इन सीटों के आवंटन की जिम्मेदारी पीओके और हुर्रियत के नेताओं को दी गई थी।गिलानी की इस्तीफे वाली चिट्ठी ने आवंटन में भ्रष्टाचार की सारी पोल खोल के रख दी थी।
10 से 20 लाख रुपए में बिकती थी एक सीट 
  10 से 20 लाख रुपए में ये एक सीट बेचते थे हैरानी की बात है की भारतीय सरकारों ने इस पर कोई एक्शन नहीं लिया जबकि यह आवंटन सन 2000 से ही शुरू हो गया था। इसमें सोपोर और बारामुला के साथ उत्तरी कश्मीर के छात्रों को पाकिस्तान में भेजा जाता था। जम्मू कश्मीर के छात्रों को पाकिस्तान में विदेशी छात्रों के वर्ग में भी दाखिला मिलता था।
विवाद के बाद ये मामला सामने आया
  सैय्यद जिलानी और गुलाम मोहम्मद सफी के बीच विवाद को लेकर ये मामला सामने आ पाया था। सफी के चार भाई बहन या तो डॉक्टर हैं या इंजिनियर।उसकी एक बेटी इस्लामाबाद में पत्रकार है।
आसानी से जम्मू कश्मीर में सरकारी नौकरी पाने का बन गया था ज़रिया 
  पुलिस, ब्यूरोक्रेट्स, अधिकारी कश्मीरी नेता सभी के बच्चे इसी माध्यम से अपने बच्चों को एमबीबीएस में दाखिला पाकिस्तान में करवाते थे और आसानी से जम्मू कश्मीर में सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेते थे। महबूबा मुफ्ती की एक सिक्युरिटी अधिकारी की बेटी ने भी पाकिस्तान के सिंध में पीपल्स यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल हेल्थ साइंसेज से पढ़ाई की है। एक रिटायर डीएसपी और पूर्व डिप्टी कमिश्नर की बेटी भी पाकिस्तानी एमबीबीएस है।
पैसों का इस्तेमाल होता था आतंकवाद में 
  गिलानी गुट के 22 और मीरवाइज धड़े के 27 अलगाववादी गुट इसमें शामिल थे। दोनो ही गुट पैसों के लेनदेन में शामिल थे। आज भी सैकड़ों कश्मीरी छात्र पाकिस्तान से एमबीबीएस कर रहे हैं। इन पैसों से वो राजाओं का जीवन जीते थे और कइयों के बच्चे विदेशों में रहते हैं। इन्ही पैसों का इस्तेमाल आतंकवाद में भी होता था। नोटबंदी ने इस रैकेट की अचानक कमर तोड़ दी थी।
  धारा 370 की समाप्ति के बाद जम्मू कश्मीर में भी वही कानून लागू होगा जो बाकि भारत में लागू होगा। पहले ऐसा नहीं था जम्मू कश्मीर का अपना संविधान और कानून था। भारत सरकार के नियम वहां पूर्णतः कभी भी लागू नहीं होते थे, इसी का फायदा वो लोग उठाते थे।
  कश्मीर के बच्चो को अब यह चिंता होती है की कहीं भारत के दूसरे प्रांतों के बच्चे कहीं उनकी सरकारी नौकरी तो नहीं ले लेंगे जबकि पहले वो खुद को भारत का हिस्सा ही नहीं मानते थे, बस इतना सा बदला है कश्मीर।

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