श्रद्धा और आस्था का केंद्र: गलियाकोट की दरगाह पर उमड़ता है अकीदतमंदों का सैलाब, हर ज़ायरीन को मिलता है सुकून
गलियाकोट/डूंगरपुर/राजस्थान।। श्रद्धा, भक्ति और अटूट आस्था की त्रिवेणी देखना हो, तो राजस्थान के डूंगरपुर जिले की सागवाड़ा तहसील के गलियाकोट कस्बे में स्थित सैयदी फखरुद्दीन शहीद (करू) की दरगाह से बेहतर कोई जगह नहीं। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह पवित्र दरगाह आज देश-विदेश के जन-जन की आस्था का एक प्रमुख केंद्र बनी हुई है। यहाँ आने वाला हर अकीदतमंद (ज़ायरीन) आत्मिक शांति और सुकून महसूस करता है।
शानदार इतिहास और निर्माण का सफर
इतिहासकारों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सैयदी फखरुद्दीन शहीद (करू) गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) राजा सिद्धराज जयसिंह (1094 से 1141 ईस्वी) के मंत्री भारमल के भाई तारमल के पुत्र थे। वे एक उच्च घराने के राजपूत परिवार से संबंध रखते थे, जिन्होंने बाद में इस्लाम धर्म कबूल किया था।
इस ऐतिहासिक दरगाह के निर्माण का सफर भी बेहद दिलचस्प है:
प्रथम निर्माण (1825 ईस्वी): इस दरगाह का प्रारंभिक निर्माण हिजरी संवत 1245 (1825 ई.) में दाऊदी बोहरा समुदाय के 45वें दाई सैयदना तैय्यब जैनुद्दीन (रि.अ.) ने ईंट, चूने और पत्थरों से करवाया था।
संगमरमर का आधुनिक स्वरूप (1951-1961): साल 1951 में 51वें दाई सैयदना ताहिर सैफुद्दीन (रि.अ.) ने इस जगह पर श्वेत संगमरमर की भव्य दरगाह बनवाने का कार्य शुरू किया, जो साल 1961 में पूरी तरह बनकर तैयार हुई।
स्थापत्य कला और कारीगरी का बेजोड़ नमूना
यह दरगाह न केवल धार्मिक रूप से बल्कि अपनी बेजोड़ वास्तुकला के लिए भी जानी जाती है। दरगाह की बाहरी दीवार पर बने मेहराबों में कमल के फूल, पत्तियां और सुंदर गुलदस्तों का अलंकरण किया गया है। इसके प्रवेश द्वार पर की गई नक्काशी (तक्षण कार्य) और चांदी के दरवाजों पर उकेरी गई कारीगरी पर्यटकों और अकीदतमंदों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
दरगाह के आंतरिक भाग में:
पवित्र कुराने पाक के यासीन खंड और आयतें बेहद खूबसूरती से अंकित हैं।
दीवारों और छतों पर झाड़-फानूस, बेल-बूटे और कमल के फूलों का सुंदर अंकन है।
कब्र मुबारक और उसके ऊपर बनी छतरी का अनूठा शिल्पांकन देखते ही बनता है।
दरगाह के बाहर बनी चार मीनारें, गुंबद पर लगा सोने का कलश और उस पर फहराता लाल झंडा उनके शहीद होने के ऐतिहासिक प्रमाण को जीवंत रूप से प्रस्तुत करता है।
विशेष नोट: प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. मलिका बोहरा ने अपनी लिखित पुस्तक 'सैयदी फखरुद्दीन शहीद करु: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गालियाकोट' में इस दरगाह और इसके इतिहास का बेहद विस्तृत और प्रामाणिक विवरण साझा किया है।
आज भी यहाँ हर मजहब के लोग सिर झुकाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। गलियाकोट की यह दरगाह सांप्रदायिक सौहार्द और अटूट विश्वास का एक अनुपम उदाहरण पेश करती है।

