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HC का ऐतिहासिक फैसला: 'पर्सनल लॉ से ऊपर POCSO', बाल विवाह पर रोक अब सब पर लागू!

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'पर्सनल लॉ से ऊपर पॉक्सो एक्ट, देश में सभी धर्मों पर लागू होगी बाल विवाह पर रोक'

प्रयागराज/उत्तर प्रदेश।। देश में बाल विवाह (Child Marriage) के खात्मे और नाबालिगों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। एक मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने दोटूक शब्दों में साफ कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून देश के सभी नागरिकों और धर्मों पर समान रूप से लागू होते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी पर्सनल लॉ (Personal Law), पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) और बाल विवाह निषेध अधिनियम से ऊपर नहीं हो सकता।

Allahabad High Court on Pocso Act


'पॉक्सो' एक धर्मनिरपेक्ष कानून, बच्चों का संरक्षण सबसे पहले

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) एक विशेष और पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानून है। इसका एकमात्र उद्देश्य देश के बच्चों को सुरक्षित माहौल देना है, इसलिए इसे किसी भी धार्मिक या पर्सनल लॉ के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि पर्सनल लॉ की आड़ लेकर नाबालिग बच्चों की शादी को कानूनी रूप से सही नहीं ठहराया जा सकता। बच्चों का शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संरक्षण, किसी भी रीति-रिवाज या व्यक्तिगत कानून से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

फैसले की 3 बड़ी और मुख्य बातें:

  • पॉक्सो एक्ट सर्वोपरि: बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा यह कानून देश के हर हिस्से और हर नागरिक पर समान रूप से लागू होगा, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।

  • पर्सनल लॉ की आड़ में बचाव नहीं: किसी भी धार्मिक नियम या पर्सनल लॉ का हवाला देकर नाबालिगों की शादी को जायज नहीं ठहराया जा सकता।

  • समान रूप से लागू होगी रोक: बाल विवाह निषेध अधिनियम का मुख्य उद्देश्य बच्चों के भविष्य की रक्षा करना है, इसलिए यह देश के हर नागरिक के लिए अनिवार्य है।

देश में छिड़ी एक नई कानूनी बहस

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद देश में बाल विवाह के खिलाफ जारी लड़ाई को एक अभूतपूर्व मजबूती मिलेगी। इस फैसले ने एक बार फिर देश में पर्सनल लॉ की सीमाओं और बाल अधिकारों की सर्वोच्चता पर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। इसे आने वाले समय में नाबालिगों के अधिकारों के लिए एक 'मील का पत्थर' माना जा रहा है।

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