तिरुमला मंदिर का वो रहस्यमयी खजाना: जब सम्राट कृष्णदेवराय ने सोने के सिक्कों से किया था भगवान वेंकटेश्वर का अभिषेक, जानें गर्भगृह में बंद 500 साल पुराने मुकुट का सच

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इतिहास के पन्नों से: विजयनगर साम्राज्य और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम का 500 साल पुराना दिव्य संबंध

तिरुपति (आंध्र प्रदेश): विजयनगर साम्राज्य और तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के बीच का गहरा आध्यात्मिक और ऐतिहासिक संबंध भारतीय इतिहास के सबसे स्वर्णिम अध्यायों में से एक है। महान सम्राट श्री कृष्णदेवराय (जिन्होंने 1509 से 1529 तक शासन किया) भगवान वेंकटेश्वर के परम भक्त थे। ऐतिहासिक और शिलालेखों के रिकॉर्ड बताते हैं कि उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान तिरुमला की सात बार पवित्र यात्राएं की थीं। इन यात्राओं में अक्सर उनकी रानियां, चिन्नादेवी और तिरुमलादेवी भी उनके साथ होती थीं।

Tirumala Tirupati


शाही भक्ति: अनमोल रत्न और स्वर्ण दान

अपनी ऐतिहासिक यात्राओं के दौरान, सम्राट श्री कृष्णदेवराय ने भगवान वेंकटेश्वर के चरणों में अपने साम्राज्य की कला, वैभव और व्यक्तिगत भक्ति का बेजोड़ संगम अर्पित किया:

  • ऐतिहासिक नवरत्न किरीटम (मुकुट): 10 फरवरी 1513 को अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के दौरान, सम्राट ने भगवान वेंकटेश्वर को एक भव्य, विशेष रूप से तैयार किया गया 'किरीटम' (मुकुट) भेंट किया था। शुद्ध सोने से बने इस मुकुट में हीरे, माणिक, पन्ना और मोती जड़े हुए हैं, जिसके केंद्र में एक नक्काशीदार कमल है। यह 16वीं सदी की दक्षिण भारतीय धातु कला का एक उत्कृष्ट नमूना है और मंदिर के आंतरिक खजाने में सबसे पुराना संरक्षित मुकुट है।

  • कनकाभिषेक और स्वर्ण-परत (गोल्ड-प्लेटिंग): इसके बाद की यात्राओं में, राजा ने भगवान का 'कनकाभिषेक' (सोने के सिक्कों से पवित्र स्नान) कराया और 30,000 से 60,000 से अधिक स्वर्ण वराह (विजयनगर काल के सोने के सिक्के) दान किए। उन्होंने आदेश दिया कि इस धन का एक बड़ा हिस्सा गर्भगृह के ऊपर बने पवित्र गुंबद, जिसे 'आनंद निलयम विमानम' कहा जाता है, को स्थायी रूप से सोने से मढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जाए। यह चमचमाता हुआ सुनहरा गुंबद आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

  • सम्राट की विनम्रता और कांस्य प्रतिमाएं: मंदिर के प्राचीन अभिलेखों के अनुसार, भगवान को अपने व्यक्तिगत आभूषण और शाही प्रतीक चिन्ह अर्पित करने के बाद, श्री कृष्णदेवराय अपने रेशमी वस्त्र त्याग कर एक साधारण नागरिक की तरह सामान्य कपड़ों में भगवान के सामने खड़े हो गए थे। पूर्ण समर्पण के इस भाव को अमर बनाने के लिए, मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के पास 'प्रतिमा मंडपम' में सम्राट और उनकी दोनों रानियों की आदमकद कांस्य (ब्रॉन्ज) मूर्तियां स्थापित की गईं, जो आज भी वहां आने वाले भक्तों का स्वागत करती हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों का सच

आजकल सोशल मीडिया पर "कृष्णदेवराय का 500 साल पुराना मूल मुकुट" शीर्षक से कई तस्वीरें वायरल होती रहती हैं। हालांकि, इसके पीछे का एक तकनीकी सच जानना जरूरी है।

दरअसल, वायरल होने वाली अधिकांश तस्वीरें आधुनिक पुनर्निर्माण, मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी या टीटीडी (TTD) खजाने के अन्य आधुनिक मुकुटों की होती हैं (जैसे कि 2009 में दान किया गया 31 किलोग्राम का हीरा और पन्ना जड़ित मुकुट)।

मूल 16वीं शताब्दी का विजयनगर साम्राज्य का मुकुट गर्भगृह के अत्यधिक सुरक्षित 'आभरण' (आभूषण) वॉल्ट के अंदर सुरक्षित रखा गया है, और इसकी तस्वीरें लेने की अनुमति नहीं होती है। इस दिव्य विरासत का असली प्रमाण आज भी मंदिर की पत्थरों की दीवारों पर खुदे प्राचीन शिलालेखों में सुरक्षित है, जो इस महान राजा द्वारा भगवान के चरणों में अर्पित किए गए सोने के एक-एक ग्राम और हर एक रत्न की गवाही देते हैं।

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