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राजपूताना इतिहास: ‘दौलड़ी ताजीम व हाथ कुरब’ के उच्च सम्मान से विभूषित बांय ठिकाने का ऐतिहासिक सफरनामा

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इतिहास के पन्नों से: बीकानेर रियासत का गौरवशाली ठिकाना 'बांय' और श्रृंगोत बीका राठौड़ों का शौर्य इतिहास

राजस्थान की पावन धरा का इतिहास वीरों की गाथाओं और उनके बलिदानों से भरा पड़ा है। इसी इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है—बांय (तारानगर), जो बीकानेर रियासत के अंतर्गत श्रृंगोत बीका राठौड़ों का एक अत्यंत प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक ठिकाना रहा है।

Bika Rathore Thikana

अपनी वीरता, निष्ठा और राजघराने के प्रति समर्पण के कारण इस ठिकाने को बीकानेर रियासत में उच्च श्रेणी का सम्मान प्राप्त था। आइए जानते हैं इस गौरवशाली ठिकाने के स्थापना काल से लेकर इसके शासकों के अद्भुत इतिहास के बारे में।

1. स्थापना और उच्च सम्मान (दौलड़ी ताजीम व हाथ कुरब)

इस ऐतिहासिक ठिकाने की स्थापना सन 1739 ई. के आसपास हुई थी। बीकानेर रियासत के 13वें शासक महाराजा जोरावर सिंह जी ने भूकरका के राव श्रृंग जी के 5वें वंशज पृथ्वीराज जी के छोटे पुत्र दौलतसिंह जी की राज्य के प्रति उत्कृष्ट सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्हें 'बांय' की जागीर सौंपी थी।

रियासती वैभव: बांय ठिकाना बीकानेर रियासत का "दौलड़ी ताजीम व हाथ कुरब" के उच्च सम्मान वाला एक प्रमुख ठिकाना था। इसके अंतर्गत 15 गांव आते थे और उस दौर में इसकी वार्षिक आय 8000 रुपये से अधिक थी। यहाँ के सरदारों को "ठाकुर" की गरिमामयी पदवी प्राप्त थी।

2. युद्ध भूमि में शौर्य और ऐतिहासिक योगदान

बांय के ठाकुरों ने केवल जागीर का संचालन ही नहीं किया, बल्कि जब-जब रियासत पर संकट आया, उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर रहकर युद्ध लड़ा।

  • जोधपुर के आक्रमण का सामना (1739 ई.): विक्रम संवत 1796 में जब जोधपुर के महाराजा अभयसिंह राठौड़ ने बीकानेर पर चढ़ाई की, तब दौलतसिंह जी ने अद्भुत वीरता दिखाई, जिसके पुरस्कार स्वरूप उन्हें बांय की जागीर मिली।

  • हरावल सेना का नेतृत्व: महाराजा गजसिंह जी के काल में भी जब जोधपुर द्वारा बीकानेर पर आक्रमण किया गया, तब बांय के ठाकुर ने सेना के हरावल (अग्रिम भाग) में रहकर शत्रु सेना के दांत खट्टे किए।

  • दिल्ली दरबार में सम्मान (1752 ई.): जब दिल्ली के मुगल बादशाह अहमदशाह द्वारा बीकानेर महाराजा गजसिंह जी को "राजराजेश्वर महाराजाधिराज" की उपाधि दी गई, तब बांय के ठाकुर दौलतसिंह के पुत्र भोपतसिंह भी वहाँ उपस्थित थे। उनकी वीरता से प्रभावित होकर बादशाह अहमदशाह ने उन्हें भी "सिरोपाव" (शाही पोशाक और सम्मान) देकर नवाजा था।

  • सिख विद्रोह और सैनिक सहायता: सन 1756 ई. में नोहर में हुए सिख विद्रोह को दबाने में यहाँ के ठाकुर ने मुख्य भूमिका निभाई। इसके बाद सन 1845 ई. के सिख-अंग्रेज संघर्ष में बीकानेर की ओर से भेजी गई सहायक सेना में बांय के मंत्री भी शामिल थे, जिन्हें युद्ध के बाद महाराजा द्वारा सोने के कड़े व सिरोपाव दिए गए।

  • 1857 की क्रांति: सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय भी बीकानेर रियासत द्वारा अंग्रेजों की सहायतार्थ भेजी गई सेना में बांय के ठाकुर ने अपनी सैन्य सेवाएं दी थीं।

  • आधुनिक काल में प्रशासनिक भूमिका: महाराजा गंगा सिंह जी के समय बांय के ठाकुर जगमाल सिंह जी की प्रशासनिक योग्यता को देखते हुए उन्हें बीकानेर की रिजेंसी कौंसिल का सदस्य निर्वाचित किया गया था।

3. मूल निकास और वंशावली (श्रृंगोत बीका शाखा)

बांय के सरदार मूल रूप से भूकरका ठिकाने से निकले हैं। ये भूकरका के राव श्रृंग जी के वंशज होने के कारण 'श्रृंगोत बीका' कहलाते हैं।

ऐतिहासिक ग्रंथों जैसे "देशदर्पण" और "नैणसी री ख्यात" के प्रामाणिक आधार पर बांय के ठाकुरों की वंशावली इस प्रकार है:

  1. ठाकुर सा. दौलतसिंह जी (संस्थापक)

  2. ठाकुर सा. बहादुर सिंह जी

  3. ठाकुर सा. पेमसिंह जी

  4. ठाकुर सा. रणजीत सिंह जी

  5. ठाकुर सा. शिवजी सिंह जी

  6. ठाकुर सा. जगमाल सिंह जी (रिजेंसी कौंसिल सदस्य)

  7. ठाकुर सा. गोविंदसिंह जी

  8. ठाकुर सा. अमरसिंह जी

(नोट: मुंशी सोहनलाल रचित "तवारिख राज श्री बीकानेर" में इस वंशावली में 'चैन सिंह' का नाम भी मिलता है, परंतु देशदर्पण व नैणसी री ख्यात में प्रामाणिकता के चलते उपर्युक्त सूची को ही सही माना गया है।)

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