वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद बढ़ा तनाव, अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ओर प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग तेज
लद्दाख / नई दिल्ली: लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा दिलाने के लिए 15 से अधिक दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा जबरन अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद आंदोलन ने अब एक नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। वांगचुक के समर्थन में उतरे देश भर के युवाओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों ने अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग क्यों?
सोनम वांगचुक को देश में एक महान शिक्षा सुधारक (Education Reformer) के रूप में देखा जाता है। उनके अनशन और बिगड़ती तबीयत को लेकर देश के शैक्षणिक जगत और युवाओं में भारी आक्रोश है।
प्रदर्शनकारियों और छात्र संगठनों का आरोप है कि देश के इतने बड़े इनोवेटर और शिक्षा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सम्मान (रेमन मैग्सेसे पुरस्कार) पाने वाले व्यक्ति की जान खतरे में है, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और सरकार इस पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। युवाओं का कहना है कि जो सरकार देश के शीर्ष शिक्षा सुधारक और युवाओं की आवाज की रक्षा नहीं कर सकती, उस मंत्रालय के प्रमुख को अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
सोनम वांगचुक के आंदोलन और अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद, अब विरोध प्रदर्शनों में प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठने लगी है। इस मांग के पीछे आंदोलनकारियों, लद्दाख के स्थानीय संगठनों और प्रदर्शनकारी युवाओं के मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण हैं:
1. लद्दाख की मांगों पर शीर्ष स्तर से सीधी सुनवाई न होना
आंदोलनकारियों का कहना है कि लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (6th Schedule) में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग लंबे समय से चल रही है। गृह मंत्रालय और सरकार के शीर्ष अधिकारियों के साथ कई दौर की वार्ता विफल हो चुकी है। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि प्रधानमंत्री देश के सर्वोच्च नीति-निर्माता हैं, और उनकी ओर से इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई सीधा आश्वासन या ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे लोगों में निराशा है।
2. 'अहंकारी सत्ता' और 'संवेदनहीनता' का आरोप
सोशल मीडिया और जमीन पर प्रदर्शन कर रहे समर्थकों (जैसे 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' और विभिन्न छात्र संगठनों) का आरोप है कि सरकार जनहित और देश के एक महान वैज्ञानिक व पर्यावरणविद् की जान की परवाह नहीं कर रही है। जब 15 से अधिक दिनों तक भूख हड़ताल पर रहने के बाद भी सरकार ने बातचीत की पहल करने के बजाय पुलिस के जरिए उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती कराया, तो जनता का गुस्सा सीधे सरकार के मुखिया (प्रधानमंत्री) पर फूट पड़ा।
3. चुनावी वादों को पूरा न करने का मुद्दा
लद्दाख के स्थानीय नेताओं और प्रदर्शनकारियों का दावा है कि पूर्व में सरकार ने लद्दाख की संस्कृति, भूमि और रोजगार के संरक्षण के वादे किए थे। लेकिन केंद्र शासित प्रदेश (UT) बनने के बाद भी वहां के लोगों को स्वायत्तता नहीं मिली। उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार अपने वादों से पीछे हट रही है, जिसके विरोध में यह मांग उठाई जा रही है।
वर्तमान स्थिति: सोनम वांगचुक को अस्पताल में मेडिकल सपोर्ट दिया जा रहा है, लेकिन उनके समर्थक इसे 'आंदोलन को दबाने की कोशिश' मान रहे हैं। यही वजह है कि यह प्रदर्शन अब केवल लद्दाख के पर्यावरण तक सीमित न रहकर, सरकार की नीतियों और सीधे प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग के साथ एक बड़े राजनीतिक विरोध का रूप लेता जा रहा है।
अस्पताल के बाहर प्रदर्शन, देश भर में फूटा गुस्सा
आज सुबह जैसे ही पुलिस ने सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से जबरन उठाकर अस्पताल के आईसीयू (ICU) में भर्ती कराया, वैसे ही लद्दाख से लेकर दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
लद्दाख में तनाव: स्थानीय लोग और युवा अस्पताल के बाहर ही धरने पर बैठ गए हैं। उनका कहना है कि जब तक सरकार मांगें पूरी नहीं करती, आंदोलन थमेगा नहीं।
सोशल मीडिया पर अभियान: इंटरनेट पर वांगचुक के समर्थन के साथ-साथ अब केंद्रीय मंत्री के खिलाफ भी अभियान चलाया जा रहा है। #DharmendraPradhanResign और #StandWithSonam जैसे हैशटैग तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं।
"जीवित रहकर लड़ना होगा" - समर्थकों की भावुक अपील
इस बीच, देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने वांगचुक से अस्पताल में ही अपना अनशन समाप्त करने का आग्रह किया है। समर्थकों का कहना है:
"यह बहरी और संवेदनहीन व्यवस्था किसी के आत्मत्याग की कद्र नहीं करती। देश के युवाओं को व्यवस्था परिवर्तन के लिए आपके लंबे मार्गदर्शन की जरूरत है। आपका स्वस्थ रहना सबसे ज्यादा जरूरी है।"
प्रशासन का रुख: प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वांगचुक को केवल उनकी गिरती सेहत और घटते ब्लड शुगर लेवल के कारण डॉक्टरों की सलाह पर अस्पताल लाया गया है, ताकि उनकी जान बचाई जा सके। हालांकि, इस कदम ने आंदोलन की आग को और भड़का दिया है और अब यह केवल लद्दाख की मांग न रहकर केंद्र सरकार के खिलाफ एक बड़े छात्र-युवा आंदोलन का रूप लेता जा रहा है।

