मुंबई की असली तस्वीर: 14,000 करोड़ की कोस्टल रोड बनाम लोकल ट्रेनों का जानलेवा सफर
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से अक्सर विकास की बड़ी-बड़ी तस्वीरें दिखाई जाती हैं, लेकिन इस चमकदार विकास के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है। मुंबई में आम नौकरीपेशा लोग और रोज़मर्रा के यात्री जान जोखिम में डालकर लोकल ट्रेनों में सफर करने के लिए मजबूर हैं। प्रसिद्ध पत्रकार फे डिसूज़ा (Faye D'Souza) ने हाल ही में अपने यूट्यूब शॉर्ट में मुंबई लोकल ट्रेन से लटकी एक महिला यात्री के वायरल वीडियो का हवाला देते हुए शहर के बुनियादी ढांचे और प्राथमिकताओं पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।
वीडियो और पत्रकार फे डिसूज़ा के मुख्य सवाल
पहचान से परे सुरक्षा का मुद्दा: फे डिसूज़ा पूछती हैं कि जब आप ट्रेन के दरवाजे पर लटकी महिला को देखते हैं, तो आपके मन में क्या आता है? क्या वह हिंदू है या मुस्लिम? क्या वह मराठी बोलती है या Gen Z है? ये सभी सवाल अप्रासंगिक हैं; असली मुद्दा यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा का है।
क्षमता से दोगुनी भीड़ और मौतों के आंकड़े: दशकों से मुंबई लोकल ट्रेनों में क्षमता से दोगुना भार रहता है। जिस डिब्बे/ट्रेन में 3,000 लोगों की क्षमता होनी चाहिए, वहां रोजाना 7,000 से ज्यादा यात्री सफर करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, हर साल मुंबई की ट्रेनों में करीब 2,400 लोगों की मौत होती है। केवल बीते वर्ष ही 500 से अधिक लोगों की जान ट्रेन से गिरने के कारण गई।
14,000 करोड़ रुपये किसके लिए? मुंबई में कार मालिकों की संख्या कुल आबादी का 10% से भी कम है। इसके बावजूद कार चलाने वाले इस वर्ग के लिए 10 किलोमीटर लंबी तटीय सड़क (Coastal Road) बनाने में 14,000 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। दूसरी ओर, मुंबई की 90% आबादी जो लोकल ट्रेनों और बसों पर निर्भर है, उनकी बुनियादी सुविधाओं को सुधारने के लिए पर्याप्त बजटीय आवंटन और प्राथमिकता की कमी दिखाई देती है।
2030 तक का लंबा इंतजार: भारतीय रेलवे ने मुंबई के लिए 238 नई लोकल ट्रेनों का ऑर्डर दिया है, लेकिन ये ट्रेनें 2030 तक चरणबद्ध तरीके से मिलेंगी। इस पर तंज कसते हुए फे कहती हैं कि लोकल ट्रेनों के दरवाजों पर लटककर सफर करने वाले आम यात्रियों को अब अगले चार सालों तक अपनी पकड़ और मजबूत रखनी होगी।
विकास के दावों की खुली पोल
एक तरफ जहां 'वंदे भारत' जैसी आधुनिक ट्रेनों को रेल विकास के प्रमुख चेहरे के रूप में पेश किया जाता है, वहीं मुंबई जैसे महानगरीय क्षेत्र में आम नागरिकों की रोज़मर्रा की यात्रा अब भी अत्यंत जोखिम भरी बनी हुई है। देश के सबसे अमीर शहर के पास लग्जरी कार सवारों के लिए तो 14,000 करोड़ रुपये तुरंत उपलब्ध हैं , लेकिन भीड़-भाड़ से जूझ रहे 90% आम यात्रियों के लिए न पर्याप्त समय है, न बजट और न ही प्रशासनिक प्राथमिकता।
स्रोत वीडियो:
आप फे डिसूज़ा का यह यूट्यूब शॉर्ट यहाँ देख सकते हैं:
