साड़ी पहनकर मैदान में उतरीं 'भारती दीदी': खुद का सपना टूटा तो 25 आदिवासी बेटियों को बनाया नेशनल फुटबॉलर
बांकुड़ा (पश्चिम बंगाल): कहते हैं कि अगर सपनों में जान हो, तो अधूरी ख्वाहिशें भी किसी और की कामयाबी का जरिया बन जाती हैं। पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले की रहने वाली भारती मुड़ी की कहानी इसका जीता-जागता सबूत है। कभी तंगहाली और सामाजिक बंदिशों के कारण खुद पेशेवर फुटबॉलर बनने से चूकीं भारती, आज कई गरीब और आदिवासी बेटियों की किस्मत बदल रही हैं।
खुद नहीं खेल पाईं, तो दूसरों को सौंपी फुटबॉल बचपन में भारती का एक ही सपना था—मैदान पर उतरकर फुटबॉल खेलना। लेकिन गरीबी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और सामाजिक रूढ़ियों ने उनका यह सपना तोड़ दिया। हार मानने के बजाय उन्होंने तय किया कि जिन बंदिशों ने उनका रास्ता रोका, वे किसी और बेटी के कदमों की बेड़ी नहीं बनेंगी। साल 2009 में उन्होंने अपने इलाके की आदिवासी लड़कियों को मुफ्त में फुटबॉल का प्रशिक्षण देना शुरू किया।
साड़ी में कोचिंग और खुद के पैसे से साजो-सामान भारती की निष्ठा की मिसाल यह है कि वे आज भी अक्सर पारंपरिक साड़ी पहनकर ही लड़कियों को ड्रिबलिंग और पासिंग के पैंतरे सिखाती हैं। उनका मानना है कि लगन के आगे साजो-सामान और पहनावा कभी रुकावट नहीं बन सकते। अपने कोचिंग सेंटर की लगभग 25 बेटियों के लिए जूते, फुटबॉल, जर्सी और अन्य सामान खरीदने के लिए वे अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च कर देती हैं।
25 में से 18 बेटियां खेल चुकी हैं राज्य के लिए भारती के इस निस्वार्थ प्रयास के नतीजे शानदार रहे हैं:
18 से अधिक खिलाड़ी: अब तक उनके सेंटर से निकली 18 से ज्यादा लड़कियां पश्चिम बंगाल की राज्य टीम का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
राष्ट्रीय मंच पर पहचान: उनकी तराशी हुई खिलाड़ी गोवा, चंडीगढ़ और भोपाल जैसे शहरों में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हुनर दिखा चुकी हैं।
रोजगार के दरवाजे: फुटबॉल के दम पर कई खिलाड़ियों को सरकारी व निजी क्षेत्रों में नौकरियां भी मिली हैं।
अपनी बेटी भी बनी रेफरी: भारती की अपनी बेटी ने भी उन्हीं से ट्रेनिंग ली और आज एक सफल फुटबॉल रेफरी के रूप में पहचान बना चुकी हैं।
चुनौतियां कम नहीं, पर हौसला बुलंद भारती का यह सफर आसान नहीं रहा। जिन बेटियों को वे ट्रेनिंग देती हैं, वे बेहद गरीब परिवारों से आती हैं। कई बार कम उम्र में शादी और सामाजिक दबाव के कारण होनहार खिलाड़ियों को मैदान छोड़ना पड़ता है। लेकिन भारती हार नहीं मानतीं। वे लगातार गांव-गांव जाकर परिजनों को समझाती हैं और खेल से जुड़ी रहती हैं।
भारती मुड़ी का जीवन साबित करता है कि सपने सिर्फ खुद के लिए पूरे करना ही कामयाबी नहीं है; कभी-कभी दूसरों के सपनों को उड़ान देना उससे भी बड़ी जीत होती है।

