जब एक किसान ने रुकवा दी 'स्वर्ण शताब्दी': सिस्टम पर भारी पड़ी न्याय की ताकत!
विशेष रिपोर्ट | लुधियाना : सरकारी महकमों के ढुलमुल रवैये और दोहरे मापदंडों के खिलाफ एक आम आदमी की लड़ाई कितनी बड़ी क्रांति ला सकती है, इसकी मिसाल पंजाब के लुधियाना में देखने को मिली। जब रेलवे प्रशासन की बेरुखी और अन्याय से तंग आकर किसान संपूर्ण सिंह ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो इतिहास का एक ऐसा पन्ना लिखा गया जिसने पूरे देश को हैरान कर दिया।
25 लाख बनाम 70 लाख: अन्याय की शुरुआत
मामला लुधियाना-चंडीगढ़ रेल लिंक के लिए ज़मीन अधिग्रहण से जुड़ा है। लुधियाना के रहने वाले किसान संपूर्ण सिंह की पुश्तैनी ज़मीन को रेलवे ने अधिग्रहित किया और उन्हें 25 लाख प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा दिया। एक सीधे-साधे किसान ने व्यवस्था पर भरोसा कर अपनी ज़मीन सौंप दी।
लेकिन अन्याय तब बेनकाब हुआ जब संपूर्ण सिंह को पता चला कि ठीक उनकी ज़मीन से सटी बगल की वैसी ही ज़मीन के लिए दूसरे किसान को ₹70 लाख प्रति एकड़ का मुआवजा दिया गया था। इस भेदभाव और अन्याय के खिलाफ उन्होंने कानून की शरण ली।
कोर्ट का आदेश और रेलवे की अकड़
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने माना कि संपूर्ण सिंह के साथ अन्याय हुआ है। कोर्ट ने रेलवे को बढ़ा हुआ मुआवजा—कुल 1.47 करोड़—तय सीमा के भीतर चुकाने का सख्त आदेश दिया।
लेकिन रेलवे प्रशासन ने अदालत के आदेश को भी गंभीरता से नहीं लिया। पूरे पैसे देने के बजाय महज 42 लाख का आंशिक भुगतान करके अफसर बैठ गए। बाकी के 1 करोड़ से ज़्यादा का बकाया दबाकर रेलवे प्रशासन यह मान बैठा था कि एक मामूली किसान उनका क्या बिगाड़ लेगा।
"जब अन्याय अपनी सीमा लांघता है, तो कानून का एक हथौड़ा भारतीय रेलवे जैसे विशालकाय महकमे के पहिए भी रोक सकता है।"
ऐतिहासिक फैसला: 'ट्रेन नंबर 12038 को ज़ब्त किया जाए!'
अधिकारियों की इस बेरुखी से तंग आकर संपूर्ण सिंह दोबारा कोर्ट पहुंचे। इस बार लुधियाना के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज ने जो फैसला सुनाया, उसने रेलवे के उच्च अधिकारियों के होश उड़ा दिए।
अदालत ने आदेश दिया:
अमृतसर-दिल्ली स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस (Train No. 12038) को संपूर्ण सिंह के नाम कुर्क (Attach) किया जाए।
लुधियाना रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर के दफ्तर को भी किसान के नाम अटैच करने का हुक्म दिया गया।
2017 का वह ऐतिहासिक दिन: प्लेटफॉर्म पर हड़कंप
साल 2017 की उस दोपहर लुधियाना स्टेशन का नज़ारा अद्भुत था। संपूर्ण सिंह अपने वकील के साथ हाथ में कोर्ट का नोटिस लिए प्लेटफॉर्म पर पहुंचे। जैसे ही स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस आकर रुकी, उन्होंने सीधे जाकर ट्रेन के लोको पायलट (ड्राइवर) को अदालत का आदेश थमा दिया—"अब यह ट्रेन कोर्ट के हुक्म से हमारी हुई।"
अचानक हुए इस घटनाक्रम से स्टेशन पर हड़कंप मच गया और अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। हालांकि, ट्रेन में सवार सैकड़ों निर्दोष यात्रियों को परेशानी न हो, इसके लिए किसान संपूर्ण सिंह ने बड़ा दिल दिखाया और ट्रेन को दिल्ली के लिए रवाना होने दिया। लेकिन तकनीकी और कानूनी रूप से वह लग्जरी ट्रेन उस वक्त एक किसान की संपत्ति बन चुकी थी।
न्याय प्रणाली और किसान के हौसले की जीत
यह मामला सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं है, बल्कि देश के उस हर आम नागरिक के विश्वास की जीत है जो सिस्टम के आगे खुद को बेबस समझता है। किसान संपूर्ण सिंह के अडिग हौसले और न्यायपालिका के इस सख्त रुख ने साबित कर दिया कि देश में कानून से ऊपर कोई नहीं है—चाहे वह भारतीय रेलवे जैसा विशालकाय संस्थान ही क्यों न हो।

