Old Age Pension सिस्टम की बेरुखी: सरपंच-सचिव के दस्तखत भी बेकार, पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर अकेला बुजुर्ग।

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सिस्टम की बेरुखी: 'डबल इंजन' सरकार में एक साल से पेंशन के लिए दर-दर भटक रहा बुजुर्ग, आधार में गलती ने बढ़ाई 'टेंशन'

बांसवाड़ा/राजस्थान।। एक तरफ केंद्र और राज्य की सरकारें गरीब कल्याण और पेंशन योजनाओं का जोर-शोर से ढिंढोरा पीट रही हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ उपखंड में एक बुजुर्ग अपनी ही पेंशन दोबारा चालू करवाने के लिए सरकारी दफ्तरों की ठोकरें खाने को मजबूर है।

क्या है पूरा मामला? यह पूरा मामला मध्यप्रदेश की सीमा से सटे खेड़ा धरती घाटा क्षेत्र के बड़ी सरवा गांव का है। यहां के निवासी बुजुर्ग भोपाल सिंह इन दिनों अपनी पेंशन को लेकर भारी 'टेंशन' में हैं। भोपाल सिंह को पूर्व में नियमित रूप से सरकारी पेंशन योजना का लाभ मिलता था, जिससे उनका जीवन-यापन होता था। लेकिन, आधार कार्ड और जन आधार कार्ड में तकनीकी त्रुटि के कारण उम्र गलत दर्ज होने से, पिछले एक साल से अधिक समय से उनकी पेंशन रोक दी गई है।

अकेलेपन और आर्थिक तंगी की मार बुजुर्ग भोपाल सिंह ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि वे इस दुनिया में अकेले हैं और अपना गुजर-बसर स्वयं करते हैं। ऐसे में पेंशन ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा थी। अचानक पेंशन बंद हो जाने से उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। उम्र के इस पड़ाव पर जहां उन्हें आराम की जरूरत है, वहीं वे पंचायत से लेकर आला अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटने को विवश हैं।

कागजी कार्रवाई पूरी, फिर भी कोई सुनवाई नहीं हैरानी की बात यह है कि बुजुर्ग ने अपनी तरफ से सारी प्रक्रिया पूरी कर ली है। भोपाल सिंह के पास पंचायत सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी (VDO) के हस्ताक्षर और मुहर वाले प्रमाणित दस्तावेज भी मौजूद हैं। इसके बावजूद, स्थानीय प्रशासन और संबंधित अधिकारी इस गरीब बुजुर्ग की पीड़ा सुनने को तैयार नहीं हैं।

प्रशासन की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल इस पूरी घटना ने सिस्टम की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  • जब पंचायत स्तर से दस्तावेज प्रमाणित हो चुके हैं, तो फिर अधिकारी पेंशन चालू क्यों नहीं कर रहे हैं?

  • क्या सरकारी योजनाओं का लाभ केवल कागजों और विज्ञापनों तक ही सीमित है?

अब पूरे गांव और क्षेत्र के लोगों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से कब जागता है। बुजुर्ग भोपाल सिंह को उनकी रुकी हुई पेंशन का लाभ दोबारा कब मिल पाएगा, या उन्हें यूं ही सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे—यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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