इतिहास के झरोखे से: मेहरानगढ़ की ओट से हुए थे राजरणछोड़जी के दर्शन, जानिए रानी जाड़ेची राजकंवर के अनूठे कृष्ण प्रेम की गाथा
सूर्यनगरी (जोधपुर)।। राजस्थान का जोधपुर शहर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, वीरता और अनोखी परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक अटूट आस्था और अनूठे कृष्ण प्रेम का प्रतीक है—राजरणछोड़जी का मंदिर। सन 1905 में करीब 1 लाख की लागत से बना यह मंदिर आज भी जोधपुर के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में शीर्ष स्थान रखता है। लेकिन इस मंदिर के निर्माण के पीछे जुड़ा इतिहास और जोधपुर की रानी जाड़ेची राजकंवर की भक्ति-गाथा किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकती है।
महज 9 वर्ष की आयु में हुआ था 'खाण्डा विवाह'
जामनगर (गुजरात) के राजा वीभा की पुत्री जाड़ेची राजकंवर का विवाह मात्र 9 वर्ष की आयु में जोधपुर के तत्कालीन राजकुमार जसवंतसिंह के साथ तय हुआ था। वर्ष 1854 में यह एक अनूठा 'खाण्डा विवाह' था, जिसमें राजकुमार स्वयं जामनगर नहीं गए थे; बल्कि उनकी तलवार भेजी गई थी। राजकुमारी ने उसी तलवार के साथ सात फेरे लिए। विवाह के बाद कुछ समय ससुराल बिताकर रानी वापस पीहर चली गईं, लेकिन 13 वर्ष की आयु में जब वे दोबारा जोधपुर आईं, तो फिर कभी लौटकर अपने पीहर नहीं गईं।
एक संकल्प जो ताउम्र निभा: रानी राजकंवर ने जब एक बार मेहरानगढ़ दुर्ग में प्रवेश किया, तो जीवनभर वे उस किले की प्राचीर से बाहर नहीं निकलीं।
किले की प्राचीर से होती थी संध्या आरती
भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त रानी जाड़ेची राजकंवर प्रतिवर्ष सवा लाख तुलसी दल अभिषेक के लिए द्वारिका भेजा करती थीं। महाराजा जसवंतसिंह के देहावसान के बाद, वृद्धावस्था में उन्होंने जोधपुर में भगवान कृष्ण के एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
रानी दुर्ग से बाहर नहीं निकल सकती थीं, इसलिए जोधपुर रेलवे स्टेशन के ठीक सामने (बाईजी का तालाब के पास) एक ऊंचे टीले पर जमीन को 30 फीट ऊंचा उठाकर मंदिर बनाया गया। उद्देश्य केवल इतना था कि रानी मेहरानगढ़ किले की प्राचीर से सीधे भगवान के दर्शन कर सकें।
अनोखी दर्शन परंपरा: संध्या आरती के समय मंदिर के पुजारी आरती की ज्योति को मंदिर के पिछवाड़े के ऊपरी हिस्से पर ले जाते थे, जहाँ से किले की प्राचीर पर खड़ी रानी आरती के दर्शन करती थीं। स्वयं रानी अपने जीवनकाल में कभी भौतिक रूप से मंदिर के भीतर नहीं गईं।
नामकरण: रानी ने अपने नाम 'राज' के साथ आराध्य 'रणछोड़' का नाम जोड़कर इस मंदिर का नाम 'राजरणछोड़ मंदिर' रखा।
स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना
रानी के पुत्र महाराजा सरदारसिंह की उपस्थिति में यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोला गया था। लाल पत्थरों से निर्मित इस मंदिर का प्रवेश द्वार और स्थापत्य कला दर्शनीय है:
प्रवेश द्वार: दो विशाल कलात्मक स्तंभों पर बेल-बूटों व सुंदर पत्तियों की नक्काशी और उन्हें जोड़ता आकर्षक मेहराब मन मोह लेता है।
गर्भ गृह: मंदिर के गर्भगृह में काले मकराना पत्थर को तराशकर बनाई गई भगवान रणछोड़जी की अत्यंत मनमोहक प्रतिमा स्थापित है।
अन्य निर्माण: श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए उस समय एक सराय बनाई गई थी, जिसे आज 'जसवंत सराय' के नाम से जाना जाता है। मंदिर के निचले हिस्से की कोटड़ियाँ अब दुकानों का रूप ले चुकी हैं।
वर्तमान में देवस्थान विभाग द्वारा प्रबंधित इस ऐतिहासिक मंदिर में हर वर्ष श्रावण मास के हिंडोले (झूले) और कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है, जहाँ हजारों श्रद्धालु शीश नवाते हैं।

