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Sailana लहू, त्याग और 11 तोपों की सलामी: सैलाना रियासत की शौर्यगाथा

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रक्तपात, त्याग और 11 तोपों की सलामी: 'मालवा के शिवाजी' और सैलाना रियासत की अनकही दास्तान

सैलाना/मध्य प्रदेश।। इतिहास के पन्ने जब भी पलटे जाते हैं, तो उनमें महलों की चकाचौंध के साथ-साथ तलवारों की खनक और अपनों के खून से लिखी गई दास्तानें भी सामने आती हैं। मालवा के आंचल में सिमटी सैलाना रियासत का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है— जहाँ सत्ता का भयंकर संघर्ष था, सहोदरों का गृहयुद्ध था, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा महान त्याग भी था जिसने भारतीय इतिहास में शौर्य की एक नई इबारत लिख दी।

Sailana Riyasat

जोधपुर के सूर्यवंशी राठौड़ राजाओं के मूल वंश से ताल्लुक रखने वाले 'रत्नावत राठौड़' साम्राज्य की यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।

सत्ता का खूनी संघर्ष और 'सगोड़े का युद्ध'

इस ऐतिहासिक ड्रामे की शुरुआत होती है 18वीं सदी की शुरुआत में, जब रतलाम रियासत के राजा केसरी सिंह की हत्या उनके ही भाइयों (जय सिंह के चाचा) द्वारा कर दी जाती है। राजा केसरी सिंह के छोटे पुत्र, राजा जय सिंह, एक बेहद महत्वाकांक्षी, दूरदर्शी और बेजोड़ योद्धा थे। वे अपने पिता के हत्यारों के अधीन रहने और उनके दमन को सहने के लिए कतई तैयार नहीं थे।

अपने वंश की रक्षा और संप्रभुता के लिए जय सिंह ने एक वफादार सेना तैयार की और रतलाम की सत्ता पर काबिज अपने चाचा के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। सन 1716 में रतलाम के पास 'सगोड़े' (सगोद) नामक स्थान पर एक विनाशकारी युद्ध हुआ। इस युद्ध में जय सिंह की रणनीतिक कुशलता के आगे विद्रोही टिक नहीं सके। जय सिंह ने निर्णायक जीत हासिल की और उनके चाचा युद्ध के मैदान में ही मारे गए।

जीत के बाद महात्याग: जब गद्दी छोड़ चुनी नई राह

सगोड़े के युद्ध में जीत के बाद रतलाम की गद्दी पर जय सिंह का पूर्ण अधिकार था। वे चाहते तो रतलाम के अधिपति बन सकते थे, लेकिन यहाँ उन्होंने भारतीय इतिहास का एक दुर्लभ उदाहरण पेश किया। अपने बड़े भाई मान सिंह के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उन्होंने रतलाम का राजपाट भाई को सौंप दिया।

स्वयं जय सिंह ने अपनी राह अलग चुनी और 'रावटी' को अपनी राजधानी बनाया। बाद में, सामरिक सुरक्षा और धार्मिक कारणों को देखते हुए सन 1736 में सैलाना शहर की स्थापना की गई और इसे एक स्वतंत्र राज्य की स्थाई राजधानी बनाया गया। अपने जीवनकाल में 22 युद्ध लड़ने वाले और कम संसाधनों में बड़े दुश्मनों को धूल चटाने वाले राजा जय सिंह को इतिहास 'मालवा का शिवाजी' के नाम से भी याद करता है।

11 तोपों की सलामी और रियासत का विभाजन

राजा जय सिंह के इस पराक्रम का असर यह हुआ कि रतलाम का विद्रोही गुट हमेशा के लिए शांत हो गया। हालांकि, इस गृहयुद्ध के कारण मूल रतलाम राज्य तीन स्वतंत्र रियासतों में बंट गया— रतलाम, सीतामऊ और सैलाना।

ब्रिटिश काल के दौरान सैलाना रियासत के रूतबे और सैन्य शक्ति को स्वीकार करते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने इसे '11 तोपों की सलामी' (11 Gun Salute) का गौरव प्रदान किया। यह सम्मान इस बात का प्रतीक था कि लगभग 500 वर्ग मील में फैली और कृषि व अफीम की आय पर टिकी यह छोटी सी रियासत, भारत की सबसे प्रतिष्ठित और शक्तिशाली रियासतों में शुमार थी।

कलह से कला की ओर: आधुनिक सैलाना और राजनीति

आजादी के बाद, जून 1948 में सैलाना का भारत संघ में विलय हो गया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज सैलाना मध्य प्रदेश की एक बेहद महत्वपूर्ण विधानसभा सीट है, जहाँ आज भी जनता के दिलों में इस राजघराने के प्रति एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सम्मान साफ देखा जा सकता है।

यूं तो इतिहास गवाह है कि आंतरिक कलह और उत्तराधिकार के विवादों ने कई साम्राज्यों को मिट्टी में मिला दिया, लेकिन सैलाना के राजाओं की सोच अलग थी। राजा दिलीप सिंह और राजा दिग्विजय सिंह जैसे शासकों ने बाद के वर्षों में होने वाले छोटे-मोटे आंतरिक मतभेदों को राज्य की कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी ऊर्जा को युद्धों के बजाय कला, साहित्य, मेहमाननवाजी और अनूठे शाही व्यंजनों (पाक कला) के विकास में लगाया। सैलाना के शाही नुस्खे आज भी पूरे देश में मशहूर हैं।

कांटों के बीच खिली नई पहचान राजा दिग्विजय सिंह ने सन 1960 के दशक में एक अनूठी सोच के साथ 'सैलाना कैक्टस गार्डन' की स्थापना की। जिस सैलाना को कभी तलवारों की धार के लिए जाना जाता था, उसे इस गार्डन ने दुनिया भर में 'कांटों की नगरी' के रूप में एक बेहद खूबसूरत और अनूठी पर्यटन पहचान दिला दी।

निष्कर्ष: सैलाना रियासत का इतिहास सिर्फ राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सत्ता के संघर्ष को सही दिशा दे दी जाए, तो वह विनाश के बजाय संस्कृति, कला और जन-कल्याण का एक नया अध्याय लिख सकती है। मालवा की माटी का यह गौरवशाली पन्ना आज भी देश के इतिहास प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

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