सनातन संस्कृति का अनूठा उदाहरण: झाबुआ में आदिवासियों ने देव-पूजन के साथ निभाई सदियों पुरानी ‘नवाई’ परंपरा
थांदला/झाबुआ। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में आदिवासी समाज आज भी अपनी आदि अनादि काल से चली आ रही सभ्यता, संस्कृति और रीति-रिवाजों को जीवंत रखे हुए है। सनातन संस्कृति की मूल जड़ माना जाने वाला आदिवासी समाज अपने गांव और कुलदेवता की परंपराओं का पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन कर रहा है। इसी कड़ी में अंचल में पारंपरिक और सांस्कृतिक उत्सव ‘नवाई’ बड़ी ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया गया।
नई फसल की खुशी में देव-पूजन की परंपरा
‘नवाई’ भील जनजातीय समाज का एक प्रमुख उत्सव है, जो खेतों में नई फसल की अच्छी उपज होने की खुशी में मनाया जाता है। इस परंपरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जब तक खेतों में पकी नई फसल अपने देवी-देवताओं को अर्पित नहीं की जाती, तब तक परिवार का कोई भी सदस्य उसका सेवन नहीं करता।
गणेश वंदन से शुरुआत और पूर्वजों को नमन
उत्सव के दिन सर्वप्रथम श्री गणेश जी के नाम से नारियल फोड़कर पूजार्चना की जाती है। इसके बाद गांव के स्थानीय देवी-देवताओं—सावन माता, बाबा खेड़ापति देव, खेड़ा ना खात्रिज, लालबाई, फूलबाई, कसुमर बाबा, हनुमान वीर, भोला ईश्वर और माता शीतला को खेतों में उगी नई फसल जैसे ककड़ी, भुट्टा, भिंडी, चावल, मूंग और ज्वार अर्पित किए जाते हैं।
इसके साथ ही अपने पूर्वजों (खत्रीज) का पूजन कर देसी दारू की धार चढ़ाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। यह पूजन जातर के बाद संपन्न होता है।
सामूहिक भोज, पारंपरिक गीत और पारिवारिक मिलन
पूजा-अर्चना समाप्त होने के बाद ही समाज में सामूहिक रूप से नए अनाज को ग्रहण करने की शुरुआत होती है। इस अवसर पर काका-बाबा, बहन-बेटियों और आसपास के ग्रामीणों को आमंत्रित किया जाता है। सभी मिलकर पारंपरिक गीतों और नृत्य के साथ नवाई का उत्सव मनाते हैं तथा परिवार व समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
साल भर आयोजित होते हैं कई सांस्कृतिक कार्यक्रम
आदिवासी अंचल में देव-स्थानों पर वर्ष भर में सामूहिक रूप से 7 से 8 प्रमुख कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें जातर, सलावनी, उज्जयिनी, नवाई, मांडला, गरबा (मुड़ा) और मान जैसे प्रमुख उत्सव शामिल हैं, जो आदिवासी समाज की अटूट धार्मिक आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं।

