'दहेज जुटाओ' के तानों से 'Padmashree' तक का सफर: मुजफ्फरपुर की मिसाल बनेगी 'किसान चाची'

0
Translate News:

रूढ़ियों को मात देकर रचा इतिहास: ताने सुनने वाली राजकुमारी देवी कैसे बनीं देश की 'किसान चाची'

मुजफ्फरपुर (बिहार): "दो बेटियां हैं, पढ़ाई में पैसे मत बर्बाद करो, दहेज जुटाओ..." जब अपनों के ही ऐसे ताने हौसले तोड़ने लगें, तो अक्सर सपने दम तोड़ देते हैं। लेकिन बिहार के मुजफ्फरपुर की एक साधारण सी महिला ने इस दकियानूसी सोच के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। वही महिला आगे चलकर न सिर्फ खुद स्वावलंबी बनीं, बल्कि हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की नई किरण बन गईं—जिन्हें आज पूरा हिंदुस्तान 'किसान चाची' राजकुमारी देवी के नाम से जानता है।

'दहेज जुटाओ' के तानों से 'पद्मश्री' तक का सफर: मुजफ्फरपुर की मिसाल बनेगी 'किसान चाची'

मैट्रिक के बाद ही बंध गईं शादी के बंधन में बचपन से शिक्षिका बनने का सपना देखने वाली राजकुमारी देवी की जिंदगी मैट्रिक पास करते ही शादी के बंधनों में बंध गई थी। दो बेटियों के जन्म के बाद ससुराल का रवैया और कड़वा हो गया। घर में फाकेकाशी के हालात थे, पति ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे और उनका मानना था कि महिलाओं का खेतों में उतरना खानदान की शान के खिलाफ है। मगर राजकुमारी देवी अपनी बेटियों का मुकद्दर बदलना चाहती थीं, और यही जिद उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

1990 से बदला वक्त का पहिया साल 1990 के दौर में उन्होंने हर विरोध को दरकिनार कर पति के साथ खेत संभाला और जैविक खेती (Organic Farming) के जरिए बंजर हालात में भी उम्मीद की फसल उगाई। इसके बाद साल 2002 में उन्होंने फूड प्रोसेसिंग का हुनर सीखा और अपनी रसोई में बने देसी अचार को एक नए मुकाम पर ले जाने की ठान ली।

साइकिल पर तय की सफलता की दूरी सड़कों पर बसों के लंबे इंतजार और झिझक को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने साइकिल चलाना सीखा। वे साइकिल पर अचार के डिब्बे लादकर रोजाना 30 से 40 किलोमीटर दूर मंडियों तक पहुंच जाती थीं। दुकान-दुकान घूमकर लोगों को स्वाद चखातीं और धीरे-धीरे अपने इस काम को एक बड़े ब्रांड में बदल दिया।

'किसान श्री' से 'पद्मश्री' तक का ऐतिहासिक सफर जिस समाज ने कभी उनके कदम रोकने की कोशिश की थी, आज वही उनकी कामयाबी के आगे नतमस्तक है।

  • 2007: कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 'किसान श्री' सम्मान से नवाजा गया।

  • 2019: भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्मश्री' से सम्मानित किया।

'किसान चाची' का यह सफर महज एक कारोबार की कामयाबी नहीं, बल्कि इस बात का जिंदा सबूत है कि अगर इरादों में दम हो, तो गरीबी, तंगदिली और समाज की बंदिशें कभी राह का रोड़ा नहीं बन सकतीं।

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)
Loading...

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top