G.D. Agrawal गंगा के नाम पर धंधा चमका, लेकिन गंगा को जिंदगी देने वाला वैज्ञानिक घुट-घुट कर मर गया

0
Translate News:

 

जब एक महान वैज्ञानिक व्यवस्था की बेरहमी और हमारी उदासीनता की भेंट चढ़ गया

नई दिल्ली: आज जब दुनिया 'क्लाइमेट चेंज', 'ग्लोबल वॉर्मिंग' और पर्यावरण संरक्षण पर बड़ी-बड़ी कॉन्फ्रेंस करती है, ग्रेटा थनबर्ग से लेकर सोनम वांगचुक तक के आंदोलनों पर सुर्खियां बनती हैं, तब भारत के इतिहास का एक ऐसा पन्ना धूल खा रहा है जिसे याद कर हर संवेदनशील नागरिक का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए।

Professor G.D. Agrawal

यह कहानी है प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल की—जिन्हें दुनिया बाद में 'स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद' के नाम से भी जानती थी। एक ऐसा इंसान जिसके पास आराम, शोहरत और विदेशों में बसने के तमाम रास्ते खुले थे, लेकिन उन्होंने अपनी मातृभूमि और मां गंगा की अविरलता को बचाने के लिए मौत को गले लगाना बेहतर समझा।

कोई 'साधारण बाबा' नहीं, दुनिया के बेहतरीन वैज्ञानिकों में से एक थे जीडी अग्रवाल

अक्सर मुख्यधारा की मीडिया और जनता अनशन पर बैठने वालों को 'बाबा' या 'आंदोलनकारी' कहकर खारिज कर देती है। लेकिन जीडी अग्रवाल की साख और उनकी पढ़ाई की तरफ देखेंगे, तो आपकी आंखें फटी की फटी रह जाएंगी:

  • उच्च शिक्षा: उन्होंने आईआईटी रुड़की (तत्कालीन रुड़की यूनिवर्सिटी) से सिविल इंजीनियरिंग की। इसके बाद उन्होंने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से पर्यावरण इंजीनियरिंग में Ph.D. की डिग्री हासिल की।

  • अकादमिक कद: वह देश के सबसे प्रीमियम संस्थान IIT कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख (HOD) रहे। उनके पढ़ाए छात्र आज दुनिया भर में बड़े पदों पर हैं।

  • प्रशासनिक योगदान: वह भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पहले सदस्य सचिव (Member Secretary) थे। यानी इस देश में प्रदूषण को नापने और नीतियां बनाने की नींव रखने वाले वे खुद थे।

जब व्यवस्था की बेरुखी के आगे हार गई एक वैज्ञानिक की जिद

साल 2018 में, 86 वर्ष की ढलती उम्र में इस वैज्ञानिक ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने, उस पर बन रहे बड़े बांधों को रुकवाने और 'गंगा महाधुत कानून' (गंगा संरक्षण अधिनियम) पास कराने के लिए हरिद्वार में आमरण अनशन शुरू किया।

111 दिनों का महा-अनशन: एक 86 साल का बुजुर्ग वैज्ञानिक 111 दिनों तक केवल पानी और शहद पर रहा। वह सरकार से कोई व्यक्तिगत रियायत नहीं मांग रहे थे, वे सिर्फ उस गंगा को बचाने की भीख मांग रहे थे जिसे यह देश 'मां' कहता है। लेकिन विडंबना देखिए—गंगा के नाम पर हजारों करोड़ के बजट पास होते रहे, बड़ी-बड़ी योजनाएं कागजों पर चलती रहीं, जेबें भरती रहीं, लेकिन गंगा को सच में साफ करने की मांग करने वाले इस नायक को सिर्फ आश्वासन और उपेक्षा मिली।

"एक ऐसा वैज्ञानिक जिसने देश की पर्यावरण नीतियों को गढ़ा, वह अपनी अंतिम सांसें ले रहा था और देश का तथाकथित 'प्रोग्रेसिव' समाज और मुख्यधारा की मीडिया आंखें मूंदे बैठा था।"

दलाल मीडिया और कृतघ्न समाज का दोहरा चेहरा

जीडी अग्रवाल के अनशन और उनके प्राण त्यागने की खबर को मीडिया ने ऐसे गायब किया जैसे कुछ हुआ ही न हो। देश की मुख्यधारा की मीडिया के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक नूराकुश्ती और खोखले राष्ट्रवाद की टीआरपी ज्यादा जरूरी थी। एक महान विचारक, जिसने देश को बचाने के लिए अपनी सुख-सुविधाएं लात मार दीं, वह चुपचाप अस्पताल के एक कमरे में दम तोड़ गया।

हम एक ऐसे कृतघ्न देश और समाज में बदल चुके हैं जो अपने असली नायकों को पहचानना भूल गया है। हम दलालों और शोर मचाने वाले अभिनेताओं को सिर-आंखों पर बिठाते हैं, लेकिन जो सच में इस जमीन, इस पानी और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए लड़ता है, उसे घुट-घुट कर मरने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।

एक अनुत्तरित सवाल...

जीडी अग्रवाल तो चले गए, लेकिन पीछे छोड़ गए एक कड़वा सवाल। उन्होंने एक ऐसा देश चुना जो उनका उपकार तक न मान सका। गंगा आज भी वैसी ही मैली है और हम आज भी उतने ही उदासीन हैं। क्या हम वाकई तरक्की कर रहे हैं, या हम अपनी ही बर्बादी के दस्तावेज पर दस्तखत कर रहे हैं?

यह देश प्रोफेसर जीडी अग्रवाल का कर्जदार रहेगा, जिसे शायद हम कभी नहीं चुका पाएंगे।

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)
Loading...

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top