बांसवाड़ा शहर में श्मशान घाट तक नहीं: बारिश में तिरपाल के सहारे हुआ अंतिम संस्कार, जन प्रतिनिधियों की अनदेखी पर ग्रामीणों में भारी आक्रोश
बांसवाड़ा, राजस्थान : "क्या लेकर तू आया है जग में, क्या लेकर तू जाएगा..." यह पंक्तियां जीवन के उस कड़वे सच को बयां करती हैं जिसे हर इंसान जानता है—जन्म के साथ मृत्यु भी तय है। लेकिन बांसवाड़ा शहर के वार्ड नंबर 15 (जानामेड़ी) में जो नजारा देखने को मिला, उसने प्रशासनिक दावों और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरी 5 साल तक सत्ता का सुख भोगने वाले नेताओं के दावों के बीच, आज भी इस गांव के लोगों के पास एक सम्मानजनक अंतिम विदाई देने के लिए श्मशान घाट तक नसीब नहीं है।
बारिश में बुझने लगी चिता, तिरपाल तानकर बचाई आग
हाल ही में जानामेड़ी में एक ग्रामीण के निधन के बाद परिजनों को खुले आसमान के नीचे अंतिम संस्कार करने पर मजबूर होना पड़ा। चिता को मुखाग्नि देने के कुछ ही देर बाद अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। चिता की आग बुझने लगी तो बदहवास परिजनों और ग्रामीणों ने मुस्तैदी दिखाते हुए तिरपाल ताना और किसी तरह बारिश की बूंदों से चिता को बचाकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की।
5 साल सत्ता का सुख, लेकिन नहीं बना एक मुक्तिधाम
विकास के तमाम बड़े दावों के बीच यह तस्वीर शासन और प्रशासन को आइना दिखाने के लिए काफी है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव आते ही हर राजनीतिक दल के नेता हाथ जोड़कर वोट मांगने पहुंच जाते हैं, लेकिन जीत के बाद गांव की इस मूलभूत और अति-आवश्यक जरूरत को भूल जाते हैं। न जाने कितने जनप्रतिनिधि आए और गए, लेकिन जानामेड़ी के निवासियों का स्थायी मुक्तिधाम का इंतजार आज भी खत्म नहीं हुआ।
उठ रहे हैं तीखे सवाल
शहर के विकास के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि:
अगर आखिरी विदाई के लिए भी लोगों को बारिश में तिरपाल तानकर संघर्ष करना पड़े, तो यह कैसा विकास है?
5 साल तक सत्ता का सुख भोगने वाले जनप्रतिनिधि एक श्मशान घाट क्यों नहीं बनवा सके?
सम्मानजनक अंतिम विदाई हर नागरिक का अधिकार है। अब देखना यह होगा कि इस बदहाली की खबर सामने आने के बाद मौजूदा सरकार और स्थानीय प्रशासन नींद से जागता है या जानामेड़ी के ग्रामीण ऐसे ही मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते रहेंगे।

