कुशलगढ़ में बदहाली की तस्वीर: न पक्का रास्ता, न छत; नदी किनारे अंतिम संस्कार करने को मजबूर तीन गांवों के ग्रामीण
कुशलगढ़/मुंदड़ी (बांसवाड़ा) : एक इंसान को उसकी अंतिम विदाई के समय कम से कम सम्मान और बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन बांसवाड़ा जिले की ग्राम पंचायत मुंदड़ी के सुनारिया गांव में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। यहां अंतिम यात्रा भी भारी अव्यवस्था और जोखिम के बीच तय होती है। बहती नदी के ठीक किनारे जलती चिता की तस्वीरें ग्रामीण विकास के दावों और प्रशासनिक संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
हाल ही में गांव के तगु डामोर की पत्नी रूपली की सर्पदंश से मृत्यु हो गई। अंतिम संस्कार के लिए परिजनों और ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ी और किनारे पर ही दाह-संस्कार करना पड़ा।
बारिश में अग्निपरीक्षा: पानी थमने और धूप खिलने का इंतजार
ग्रामीणों के अनुसार, यह समस्या किसी एक दिन की नहीं बल्कि वर्षों पुरानी है। बारिश के दिनों में स्थिति भयानक हो जाती है। जब नदी का जलस्तर बढ़ता है, तो श्मशान घाट तक पहुंचना असंभव हो जाता है। ऐसे में कई बार परिजनों को शव लेकर बारिश रुकने और पानी कम होने का घंटों इंतजार करना पड़ता है। safe स्थान न होने के कारण गीली लकड़ियों और उफनती नदी के बीच किसी तरह अंतिम संस्कार संपन्न किया जाता है।
तीन गांवों का एक ही ठिकाना, सुविधाएं शून्य
सुनारिया स्थित इस श्मशान स्थल पर आसपास के करीब तीन गांवों के लोग अंतिम संस्कार के लिए आते हैं। ग्राम पंचायत मुंदड़ी के अंतर्गत आने वाले इस क्षेत्र में सुनारिया सहित मुंदड़ी, नाथपुरा, हमीरपुरा और काजलपाड़ा जैसी बस्तियां जुड़ी हुई हैं। इसके बावजूद, आज तक इस स्थल को श्मशान घाट के रूप में विकसित नहीं किया जा सका है। परिसीमन बदले, जनप्रतिनिधि बदले, लेकिन श्मशान घाट की तस्वीर नहीं बदली।
मुख्य समस्याएं:
पक्के रास्ते का अभाव: श्मशान तक जाने के लिए कोई सीसी सड़क या पुलिया नहीं है।
पेयजल संकट: अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले लोगों के लिए पानी पीने हेतु कोई हैंडपंप नहीं है।
अंधेरे में अंतिम विदाई: प्रकाश की कोई व्यवस्था न होने से रात के समय अंतिम संस्कार करना बेहद जोखिम भरा होता है।
शेड का न होना: बारिश और धूप से बचाव के लिए पक्के शेड का निर्माण नहीं कराया गया है।
चुनावी वादों के बीच ग्रामीणों का सीधा सवाल
वर्तमान में पंचायती राज चुनावों को लेकर क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मी तेज है। भावी सरपंच, पंचायत समिति और जिला परिषद प्रत्याशी वोट मांगने घर-घर पहुंच रहे हैं। ऐसे में ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने तीखे सवाल दागे हैं:
क्या सुनारिया श्मशान घाट तक पक्की सड़क और शेड का निर्माण किसी प्रत्याशी के एजेंडे में है?
क्या चुनाव सिर्फ पद पाने के लिए लड़े जा रहे हैं या बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए?
बरसात में नदी पार करने की मजबूरी का स्थायी समाधान (पुलिया/रास्ता) कब बनेगा?
यदि पूर्व में श्मशान घाट के नाम पर कोई राशि स्वीकृत हुई, तो वह कहां खर्च हुई?
अब चुप रहने का समय नहीं
यह किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और नागरिक अधिकारों से जुड़ा मामला है। बहती नदी के किनारे जलती चिता की यह तस्वीर हर जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि को झकझोरने के लिए काफी है। विकास का मतलब सिर्फ कागजी योजनाएं नहीं, बल्कि नागरिक को सम्मानजनक अंतिम विदाई की सुविधा देना भी है।
ग्रामीणों की मांग स्पष्ट और एकजुट है—श्मशान घाट का तुरंत पक्का निर्माण कराया जाए, सीसी सड़क बने, पेयजल व रोशनी की व्यवस्था हो ताकि भविष्य में किसी परिवार को अपने परिजन के अंतिम संस्कार के लिए मौसम या नदी के पानी के थमने का इंतजार न करना पड़े।


