XRBIA–L&T–ARCIL मामला: क्या FIR 424/2026 महज़ बिल्डर-केंद्रित ड्रामा है, या ₹1,558 करोड़ के मनी ट्रेल की जाँच अभी बाकी है?
मुंबई: XRBIA हाउसिंग स्कैम में शिवाजी पार्क पुलिस स्टेशन द्वारा दर्ज FIR नंबर 0424/2026 (दिनांक 10 अगस्त 2026) के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ₹1,558.31 करोड़ के इस कथित वित्तीय घोटाले में जहाँ एक ओर राहुल नाहर, विशाल नाहर और XRBIA ग्रुप को नामजद किया गया है, वहीं हज़ारों होम बायर्स ने इस FIR की क्रोनोलॉजी और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
पीड़ित खरीदारों का कहना है कि 2016 से 2022 के बीच हुए इस कथित फ्रॉड की FIR अगस्त 2026 में दर्ज होना कई संदेह पैदा करता है। उनका आरोप है कि पूरी जाँच को केवल "बिल्डर बनाम ARCIL" के विवाद तक सीमित करने की कोशिश की जा रही है, जबकि वित्तीय संस्थाओं, एस्क्रो खातों और मनी ट्रेल की निष्पक्ष फॉरेंसिक जाँच (Forensic Audit) पूरी तरह गायब है।
कैसी रही ₹1,558 करोड़ के दावे की यात्रा?
होम बायर्स द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस पूरे मामले में वित्तीय देनदारी जिस तरह बढ़ी है, वह फॉरेंसिक रीकंसिलेशन का विषय है:
2017–2023 (बायर्स कलेक्शन): XRBIA वांगणी प्रोजेक्ट के चार फेज़ से ही लगभग ₹400+ करोड़ का कलेक्शन और ₹200+ करोड़ का विड्रॉल/फंड डायवर्जन दर्ज किया गया था।
29 मार्च 2023 (असाइनमेंट एग्रीमेंट): L&T फाइनेंस ने अपने एक्सआरबीआईए-संबंधित सभी अधिकार और मॉर्गेज राइट्स ARCIL को ट्रांसफर कर दिए।
11 जुलाई 2023 (SARFAESI नोटिस): ARCIL ने SARFAESI एक्ट की धारा 13(2) के तहत लगभग ₹943.17 करोड़ की मांग का नोटिस भेजा।
2024 (बढ़ती देनदारी): ARCIL के दस्तावेज़ों में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग ₹1,113.44 करोड़ हो गया।
10 अगस्त 2026 (FIR 424/2026): शिवाजी पार्क पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR में कुल रकम ₹1,558.31 करोड़ दर्शाई गई।
होम बायर्स के 5 सीधे सवाल:
फंड डायवर्जन का ज़िम्मेदार कौन? होम बायर्स के करोड़ों रुपये जब एस्क्रो खातों (Escrow Accounts) में आ रहे थे, तो बैंक और रेगुलेटरी निगरानी एजेंसियों ने संदिग्ध ट्रांजेक्शन पर रोक क्यों नहीं लगाई?
मूल प्रिंसिपल राशि (Principal Amount) कितनी थी? मूल ऋण कितना था और उसमें कितना ब्याज, पेनल्टी या अन्य चार्ज जोड़कर आंकड़ा ₹1,558 करोड़ तक पहुँचाया गया? L&T और ARCIL इसका ब्योरा सार्वजनिक करें।
L&T और ARCIL की भूमिका: L&T फाइनेंस द्वारा ARCIL को एनओसी और मॉर्गेज राइट्स किस आधार पर बेचे गए? क्या इस पूरी प्रक्रिया में खरीदारों के हितों का ध्यान रखा गया?
4 साल की देरी क्यों? यदि अपराध 2016 से 2022 के बीच का है, तो FIR दर्ज कराने में अगस्त 2026 तक का इंतज़ार क्यों किया गया?
असली पीड़ित कौन? क्या यह FIR केवल एक रिकवरी प्रोसीडिंग है, या इसमें हज़ारों बेघर हुए खरीदारों को न्याय दिलाने की कोई योजना है?
मुख्य मांगें
पीड़ित होम बायर्स संघ ने मांग की है कि मामले को केवल बिल्डर तक सीमित न रखकर एक स्वतंत्र SIT (विशेष जाँच दल) या EOW के ज़रिए पूरी 'फाइनेंशियल चेन' की जाँच कराई जाए। हर एक रुपये का ट्रेल (होम बायर कलेक्शन ➔ एस्क्रो अकाउंट ➔ L&T/ARCIL) सार्वजनिक किया जाए ताकि हज़ारों खरीदारों की गाढ़ी कमाई का वास्तविक हिसाब सामने आ सके।

